भक्ति करने के लिए केवल परमार्थ ही पर्याप्त नहीं होता


 


महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं कि: खाली माला फेरने से नहीं भगवान प्रसन्न होते। चीटीं को आँटा, चिड़ियों को चावल खिलाने से वैकुण्ठ होता है। सड़क पर खूँटी लगी हो, निकाल दो। वहाँ सब लिखा जाता है। बिना दया, भजन से लाभ न होगा।


संभवतः महाराज जी हमें यहाँ पर समझा रहे हैं की भगवान की भक्ति करने के लिए केवल परमार्थ ही पर्याप्त नहीं होता है, भगवान को प्रसन्न करने लिए परमार्थ के साथ -साथ, परस्वार्थ करना भी आवश्यक होता है।


वैसे भी हममें से बहुत से लोग ईश्वर की भक्ति करते समय, उससे कुछ ना कुछ मांगते ही रहते हैं (सुख- संपत्ति घर आवे…………. इत्यादि)। अब वो सर्वशक्तिशाली है तो मांगेंगे भी उसी से, लेकिन केवल मांगने से तो ईश्वर का प्रसन्न होना संभव नहीं है ……. महाराज जी कहते हैं की इसके लिए हमें अपने अंदर उसी के बनाए हुए अन्य मनुष्य, पशु- पक्षी इत्यादि के लिए दया का भाव रखना होगा और इस दया भावना से प्रेरित होकर हमें वंचितों की, निस्वार्थ भाव से और अपने सामर्थ के अनुसार मदद करनी होगी।


ऐसे लोग जो हमारे सगे -सम्बन्धी नहीं हैं (क्योंकि अपनों की मदद बहुत से लोग करते ही हैं) या जो हमारी मदद को वापस करने में सक्षम भी ना लगें उनकी मदद कर सकते हैं।


जो बीमारी में इलाज करा सकने में सक्षम ना हो या ज़रूरतमंद बच्चों की शिक्षा में मदद कर सकते हैं और ज़रूरी नहीं है कि वो मदद हमेशा पैसे से ही हो -हालात के हिसाब से,जैसी भी मदद हमसे बन पड़ती हो, हम वो कर सकते हैं।


ऐसे लोग जिनके पास पहनने के लिए ढंग के कपडे ना हो, जूता -चप्पल ना हो -उनकी ज़रूरतों के लिए हम यथा संभव मदद कर सकते है।


किसी भूखे को खाना खिलने को तो महाराज जी ने बहुत ही बड़ा पुण्य कहा है। राह चलते अगर कोई भूखा मिल जाए तो इसके ऐसे भी लोग होते हैं जो साथ में बिस्कुट वगैरह का पैकेट लेकर चलते है और ज़रूरतमंदो में बाँट देते हैं। किसी पास के ढाबे में भी खाना खिला सकते हैं और खिचड़ी की सामग्री के पैकेट बनाकर बाँटने के, महाराज जी की विशेष उपदेश के महत्त्व के बारे में तो हम इस पटल पर समय -समय पर चर्चा करते ही रहते हैं। घर में जो खाना बना हो उसमें से या कच्चा खाना भी पशु -पक्षियों को खिला सकते हैं।


संक्षेप में अगर हमारी मदद करने की भावना है तो इसके लिए अनेकों संभावनाएं हो सकती है। नहीं तो केवल पूजा -पाठ या जैसे महाराज जी कहते हैं माला फेरने से हमें  लाभ नहीं होता। अपनी मदद का प्रचार तो बिलकुल ही नहीं करना चाहिए वर्ना जैसे महाराज जी कहते है कि ऐसे कर्मों की परमात्मा के दरबार में गिनती नहीं होती है।


परमात्मा की नज़र से हमारा कोई भी कर्म बचा नहीं रहता - अच्छा कर्म भी और बुरा कर्म भी। दया-करुणा की निस्वार्थ भावना और इसे प्रेरित होकर कर्म करने से ही हमारे पूजा-पाठ का असर होता है- हमारे ऊपर भी और परमात्मा के ऊपर भी। ऐसे वंचितों में भी, हमारी ही तरह, उस सर्वशक्तशाली परम आत्मा के अंश का वास है -आखिरकार मनुष्य, पशु -पक्षी सबके अंदर आत्मा ही तो रहती है। तो जब हम भगवान के बनाए हुए बन्दों के काम आएंगे तो भगवान को तो अच्छा ही लगेगा।


महाराज जी सबका भला करें।


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