मिथिला में नवरात्र



बिहार प्रान्त का अभिन्न अंग है "मिथिला"। मिथिला बाढ़, पानी, बेरोजगारी और पलायन के लिए ही नही जाना जाता है यहाँ की अद्भुत परम्परा, संस्कृति और उसे पूरा करने का अदम्य साहस भी इसकी पहचान है। मिथिला को धाम कहा जाता है यानि मिथिला धाम। धाम शब्द का प्रयोग हिन्दू धर्म में ईश्वर का जहाँ निवास होता है उसके लिए किया जाता है। मिथिला जगत माता सीता की जन्मभूमि है। यहां माँ जानकी पुत्री के रूप में आई और भगवान शिव नौकर के रूप में।


मिथिला में एक से बढ़ कर एक विद्वान हुए यहाँ तोता भी संस्कृत में ही बात करता था। मिथिला में पर्व त्योहारों का अपना अलग महत्व है। लोगों से आपने सुना होगा नवरात्रि बंगाल में बहुत अच्छे से मनाया जाता है लेकिन यकीन मानिए अगर आप एक बार मिथिला का नवरात्र देख लेंगे तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे। आप को खुद की आंखों पर भरोसा नहीं होगा।



17 अक्टूबर से नवरात्र शुरू है और 25 अक्टूबर को समाप्ति है। सप्तमी के दिन से दशमी (दशहरा) तक भव्य मेला व विभिन्न आयोजन होते हैं। इस 9 दिन में आप मिथिला के किसी भी क्षेत्र से गुजरेंगे तो मंत्रोच्चारण की ध्वनि और फिजाओं में सरर, धूमन(गूगल) की खुशबू आपको मंत्रमुग्ध कर देगा। नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना से लेकर मूर्ति विसर्जन तक मिथिला का हर शख्स आपको व्यस्त ही नजर आएगा। कलश स्थापना तो हर जगह और लगभग हर घर में होता है लेकिन मिथिला में कलश स्थापना सिने(छाती) पर भी होता है। यहाँ माता के ऐसे भक्त भी मिलेंगे जो अपनी छाती पर कलश स्थापना कर 9 दिन जस के तस पड़े रहते है और माँ दुर्गा के आशीर्वाद से वो सफल भी हो जाते हैं।


घंटे दो घंटे तक व्यक्ति एक करवट सो नही पता उसे करवट बदलना ही पड़ता है अब सोचिए कोई व्यक्ति बिना करवट बदले, बिना हिले, बिना खाये पिये, बिना नित्यकर्म के अपनी छाती पर कलश का बोझ उठाये लगातार 9 दिनों तक कैसे रह लेता है। आपको मिथिला के दुर्गा मंदिरों में तमाम ऐसे पुरूष व महिला भक्त मिलेंगे जो भक्ति के पराकाष्ठा को पार करते हुए अपने सीने पर/पेट पर कलश स्थापना किये हुए मिलेंगे, जिसे देखकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे। ऐसा कर पाना माता के आशीर्वाद और व्रत को पूरा करने का अदम्य साहस से ही संभव है।


जितेन्द्र झा


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