हमारे कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है


प्रश्न: महात्मन, अनेक कारणों से मन अशान्त रहता है, यह कब और कैसे शान्त होगा?
उत्तर: (तदनुसार महाराज जी भक्तों को मन को शांत करने के कुछ तरीके बता रहे हैं): 
1. किसी देवी -देवता का जप-पाठ मन लगाकर किये बिना शुभ काम नहीं होता। कबीर दास जी ने कहा है कि एक घड़ी हर (हरि-ईश्वर) की तो ५९ घड़ी घर की लेकिन मन तो एक घड़ी भी नहीं लगता।

अपने इष्ट को या जिस भी देवी- देवता को हम मानते हों, सच्चे मन से उन्हें हमें नित्य याद करना चाहिए, जितना भी देर के लिए हमारे लिए संभव हो। मन लगाने के लिए महाराज जी कहते भी हैं कि मन के साथ कभी-कभी ज़बरदस्ती करनी पड़ती है। मन लगाने के महाराज जी द्वारा बताए गए मार्गों का हम समय -समय पर इस पटल पर चर्चा करते हैं। जल्दी ही फिर से करेंगे।

2. लोग रोज मरते और पैदा होते देखकर भी हम समय, स्वांसा और शरीर को अपना मानते हैं- यही भूल है। उसके दिमाग में यह बात घुसी है कि हम नहीं मरेंगे। वह मौत और भगवान को भूला है। वाकई में हम लोग अपने आस- पास अपने- परायों की मृत्यु होती देखते ही रहते हैं परन्तु कुछ ही लोगों को इस बात का एहसास होता है की हमारा नंबर कभी भी आ सकता है… जैसा ईश्वर ने तय किया होगा। इसलिए जितनी भी हमारी आयु हुई हो, हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपने या अपनों के स्वार्थ के लिए हम दूसरों की आँखों में आंसू ना लाएं, हम जीवन में दूसरों को दुःख कम से कम दें, अपने वाणी पर विशेषकर ध्यान रखते हुए।

हमारे अधिकतर कर्मों का फल इसी जन्म में मिल जाता है। हमारे पापों का, बुरे कर्मों का फल यदि बुढ़ापे में ईश्वर ने देना तय किया हो, जब हमारे अंग ठीक से काम नहीं करते हैं और अपने छोटे -छोटे काम के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं - तो ऐसे में जीवन नर्क समान हो जाता है। उस समय हमारी मदद कोई नहीं सकता….. क्योंकि अपने प्रारब्ध तो सभी को काटने होते हैं। 
ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए महाराज जी के भक्तों को अच्छे -बुरे काम करने के पहले ये सोचना अच्छा होगा की जो हम कर रहे हैं या करने जा रहे हैं वो क्यों कर रहे हैं ?? और यदि वो काम महाराज जी के उपदेशों के विपरीत है तो बेहतर है ना करें।

3. जो सबका भला चाहता है वही आदमी, आदमी है। जो केवल अपना भला चाहता है वह आदमी नहीं है। उसकी गती नहीं होती है। क्योंकि उसमें दया. धर्म नहीं है। अपनों के लिए करना अच्छी बात है, करना भी चाहिए लेकिन दूसरों की उपेक्षा अनुचित है विशेषकर तब, जब हमारे समीप कोई परेशानी में हो, दुःख में हो, जरूरमंद हो और हम उसकी मदद करने में सक्षम होते हुए भी ऐसा नहीं करते हैं। फिर हम चाहे जितना पूजा-पाठ , कीर्तन-भजन, कथा -सत्संग करते हों- वो सर्वशक्तिशाली परम आत्मा हमें इसका लाभ नहीं देगा।

महाराज जी हमें समझाया है कि अंततः स्वयं के कल्याण के लिए ही -हमें हर ज़रूरतमंद की मदद करनी होगी अपने सामर्थ के अनुसार, विशेषकर ऐसे वंचित जिन्हे हम ठीक से नहीं जानते या जो हमें अकस्मात मिल जाये या जो हमारे उपकार का बदला भी न चुका सकें -बिना किसी अपेक्षा के और जाति और धर्म से ऊपर उठकर। महाराज जी ने हम लोगों से कई बार कहा है कि दया और सेवा धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

इसलिए जिन्हें मन की शांति की तृष्णा है उन्हें महाराज जी के इस उपदेश को समय -समय पर पढ़कर, मनन करते हुए इस पर चलने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए।

महाराज जी की कृपा दृष्टि सब भक्तों पर बनी रहे।

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