जीवन के हर उतार-चढाव में उस परम आत्मा को याद करते रहना चाहिए

 
महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं- कर्मानुसार भगवान सब को देते हैं। 'मुस्लिम चरित्र' (पुस्तक) में भगवान अबूहसन से कहे हैं- अबूहसन मेरी आज्ञा में सदा तत्पर रहना, क्योंकि मैं सदा जीता-जागता हूँ। मैं जिस तरह राखूं उसी तरह रहे। वही हमारा भक्त है। तो मैं उसकी इच्छा से अधिक देता हूँ। जैसे मेरा नाश नहीं, वैसे भक्त का नास नहीं है। उसे अविनाशी स्वराज्य देता हूँ मैं। मुझमें उसकी सुरति लगी रहे। यही भजन है। जैसे मैं मृत्यु से परे हूँ, वैसे वह हो जावेगा।
 
हम सब आत्माओं को शरीर रूपी वस्त्र मिला हुआ है जो हम मृत्यु के पश्चात् त्याग देते हैं। मृत्यु के पश्चात् शरीर भी मिटटी हो जाता है (उसी में वापस मिल जाता है) और उसे वैसे ही मिटटी बुलाते भी हैं लेकिन मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं -हमारी नहीं। इसलिए जैसे उस परम आत्मा का नाश नहीं हो सकता वैसे ही आत्मा का (हमारा) नाश भी नहीं हो सकता। क्योंकि आत्मा है तो उस परम आत्मा का ही अंश है। महाराज जी आगे समझाते हैं कि हममें से जो भी यह परम सत्य याद रखने में, समझने में सक्षम है, वैसा ही आचरण करता और उस परम आत्मा में अपना मन, सुरति लगाए रखता है तो उसका कल्याण निश्चित है और यहाँ पर महाराज जी एक बार फिर से 'मुस्लिम चरित्र' (पुस्तक) के माध्यम से समझा रहे हैं कि हमारे इस जीवन में जो भी हुआ है, जो होगा और जो भी वर्तमान में हमारी परिस्थितियां हैं -वो सब है तो उस परम आत्मा की बनायीं हुईं -लेकिन इनके होने का कारण केवल और केवल हमारे (पूर्व) कर्म हैं।
 
जब हम किसी को दुःख देते हैं, किसी के साथ छल-कपट करते हैं या किसी की मदद करते हैं- वो परम आत्मा हमारे सब कर्मों को देखता रहता है -निरंतर। तदनुसार वो परम आत्मा कर्मानुसार (अच्छा या बुरा) सबको फल देता है-सदैव। हमें इस बात को गांठ बाँध के रख लेनी है और समय -समय पर अपने आप को याद दिलाने का प्रयत्न भी करना है। यदि संघर्ष का समय चल रहा है तो उसको भोगना तो पड़ेगा और ऐसा समय जब तक है तब तक हम ईश्वर को स्वतः ही याद करते हैं। गुहार लगाते हैं। यदि अच्छा समय चल रहा है तो इसको भी भोगिए, आनंद लीजिये- जब तक चल रहा है लेकिन ईश्वर के प्रति कृतज्ञ भी रहिये - निरंतर।
 
संक्षेप में महाराज जी के भक्तों को जीवन के हर उतर -चढाव में उस परम आत्मा को याद करते रहना है- किसी भी रूप में, किसी भी विधि से जो भी हमारे लिए सरल हो, हमें प्रिय हो। वो परम आत्मा तो सर्वव्यापी है -हर जगह है, हर दिशा में है, हर चीज़ में है क्योंकि ये संसार उसी ने तो बनाया है। वो परम आत्मा आत्मा सर्व-शक्तिशाली भी है- वो कुछ भी, कभी भी कर सकता है। इसलिए हम महाराज जी भक्तों को याद रखने की कोशिश करते रहना है की हमारे साथ जो भी हो रहा है वो उस परम आत्मा की मर्ज़ी से है। इसलिए जैसा उसने हमें रखा है उन परिस्थितियों को स्वीकारने में ही हमारा हित है। प्रारब्ध का सामना करते समय कभी -कभी हम लोग हालात से समझौता कर पाने में असमर्थ हो जाते हैं। अधीर हो जाते हैं और अविवेक की अवस्था में अपने -परायों के साथ बुरा व्यवहार कर जाते हैं उन्हें दुःख भी पहुंचाते हैं।
 
ये दुखद होता है और उनका फल भोगते समय भी पीड़ा होती है, कभी-कभी उस पीड़ा से भी अधिक जिसका सामना ना कर पाने की वजह से हमने अधीर होकर ये दुर्व्यवहार/ बुरे कर्म किये थे….महाराज जी ने इस स्तिथि को एक जगह नर्क की दशा के समान कहा है। ऐसी स्थिति में अपने आप को डालने से हमें बचाना है। हमारा कल सुखद हो इसके लिए वर्तमान परिस्थिति में हमें अपने विवेक का उपयोग करके कर्म करने हैं। अपनी आत्मा की आवाज़ सुननी है जो हमें गलत कर्म करने से पहले एक बार सावधान करती ज़रूर हैं। और सच्चे भक्तों के साथ महाराज भी हैं- सदैव। इस बात को याद दिलाते रहना है और डरने की आवश्यकता नहीं है।
 
यदि हमने उस परम आत्मा को, महाराज जी को सच्चे मन से निरंतर याद किया है, भजन किया है, उनके सत्संग में हिस्सा लिया है या और किसी मार्ग से भक्ति की है तो कर्मों का फल भोगते समय भी ये दोनों हमारे साथ भी होंगे इसलिए अंततः बुरा तो हो ही नहीं सकता। वो परम आत्मा बहुत ही कृपालु है, दयालु है और सच्चे भाव से भक्ति करने वाले भक्त के कल्याण के पथ में वो परम आत्मा, महाराज जी के आशीर्वाद से -उस भक्त की इच्छा से कहीं अधिक देता है।
 
महाराज जी की कृपा सब भक्तों पर बनी रहे।

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