कुछ दिव्य-ग्रंथों को पढ़ने वाले बहुत से लोग अपने आप को ज्ञानी मान लेते हैं


मूड़ मुड़ाने या दाढ़ी रखने, कपड़ा रंगने, दंड कमन्डल रखने से कुछ न होई।

महाराज जी यहाँ पर संभवतः उन लोगों की बात कर रहे हैं जो बात तो अध्यात्म की करते हैं, भक्ति की करते हैं लेकिन इसे जुड़ा आचरण नहीं करते। लोगों को भ्रमित भी करते हैं। ऐसे लोग भक्ति का प्रदर्शन करते है - तिलक लगा लिया, सर मुंडा लिया, दाढ़ी रख ली, रंगे कपडे पहन लिए, कुछ तो चिमटा, दंड- कमंडल इत्यादि भी लेकर चलते हैं। ऐसा नहीं इस तरह के सभी लोग आज के समाज में ऐसे होते हैं लेकिन अधिकांश होते हैं - दुर्भाग्यवश। दूसरों से अपनी अपेक्षा के अनुसार दान -दक्षिणा, आदर -सत्कार ना मिलने पर ये अभद्र व्यवहार भी कर सकते हैं। ये अपेक्षा इनका अहंकार होती है। ऐसे लोगों में विकारों ने घर किया होता है।

वैसे ही कुछ दिव्य- ग्रंथों के पढ़ने वाले बहुत से लोग अपने आप को ज्ञानी मान लेते हैं। प्रायः वाद -विवाद करने में तत्पर भी रहते हैं। औरों से ये अपेक्षा रखते हैं की वे उनका आदर करें। ये अहंकार है जो कि आगे पीछे ऐसे लोगों के लिए ही समस्या बनता है !! वास्तव में ऐसे लोग केवल किताबी ज्ञानी होते हैं, ग्रंथों के केवल जानकार होते हैं। जैसे हमारे महाराज जी समय समय पर हम लोगों को याद दिलाते रहे हैं, असली ज्ञानी वही होता है जो दिव्य ग्रंथों के ज्ञान को पढ़ने के साथ -साथ, ना केवल उस पर मनन करते रहते हैं बल्कि उसके अनुसार जीवन में आचरण भी करता है।

महाराज जी ने हमें ऐसे लोगों से कई बार सतर्क रहने को कहा है।उन्हें हमारी चिंता है। उन्हें हम सब का ध्यान रहता है। महाराज जी के लिए सब भक्त बराबर हैं। और महाराज जी को हम वैसे हीअपने समीप पाएंगे, उनकी कृपा के पात्र बनेंगे -जैसे हमारे भाव होंगे उनके लिए। साधुता कभी भी बाहरी या वेशभूषा की हो ही नहीं सकती। जिसका मन साधु हो जाता है, जिसके अंदर साधुता जाग जाती है उसे उसका प्रदर्शन करते की आवश्यकता नहीं होती। एक सच्चा साधु कुटिल वचन (कड़वी बात) आसानी से सह लेता है। उसमें अहंकार लेश मात्र भी नहीं होता है। उसने क्रोध पर काबू कर लिया होता है।

जैसे महाराज जी कहते हैं जिसके अंदर साधु भाव होता है वह सर्वप्रथम घूर बन जाता है, बिना खता कसूर अगर उसे कोई चार बात कहता भी है तो वह सहन कर के हाथ जोड़ लेता है। उसने विकारों का दमन कर रखा होता है। वैसे ही एक सच्चा ज्ञानी: उस ज्ञान में निहित सन्देश पर मनन करता है जिसका उसने अध्ययन किया हो या अध्ययन करता हो -निरंतर, जैसा ऊपर कहा गया है। तदनुसार वैसा ही आचरण करता है। अहंकार, ज्ञान का प्रदर्शन, ज्ञान की मार्केटिंग इत्यादि के बारे में सोचता भी नहीं है।

संकट में फंसे किसी भी जीव -जंतुओं के लिए दया भाव रखता हो और सामर्थ अनुसार उनकी मदद भी करता है। अपने -परायों के साथ प्रेम की भावना रखता है। विनम्र रहकर, प्रेम से सभी से बात करता है। महाराज जी के भक्त अपने विवेक का सर्वार्धिक उपयोग करें और महाराज जी की कृपा का पात्र बनें।

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