सत्य, प्रेम और करुणा ये धर्म का मूल है

 
मेहनत करने से दरिद्रता, धर्म करने से पाप और मौन धारण करने से कभी भी कलह नहीं रहता है।" मेहनत- जिस प्रकार से दस-दस फुट के दस अथवा तो बीस गड्ढे अलग-अलग जगहों पर खोदने पर भी जल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। मगर 70-80 फुट का गड्ढा एक ही जगह पर खोदा जाए तो जल की प्राप्ति अवश्य हो जाती है।
 
ठीक इसी प्रकार मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं अपितु उचित दिशा में अथवा तो एक ही दिशा में मेहनत करना भी अनिवार्य हो जाता है। धर्म- निसंदेह धर्ममय आचरण ही पापों से मुक्त करता है। सत्य, प्रेम और करुणा ये धर्म का मूल है। धर्म को समग्रता की दृष्टि से देखा जाए तो परोपकार, परमार्थ, प्राणीमात्र की सेवा, सद्कर्म, श्रेष्ठ कर्म, सद ग्रंथ अथवा तो सत्संग का आश्रय, ये सभी धर्म के ही रूप हैं। जब व्यक्ति द्वारा इन दैवीय गुणों को जीवन में उतारा जाता है तो उसकी पाप की वृत्तियां स्वतः नष्ट होने लगती हैं।
 
मौन- परिवार अथवा समाज में जब तक दो लोगों में अथवा दो पक्षों में से एक मौन रहता है, तब तक संभव ही नहीं कि कोई विवाद हो। मौन का टूटना ही परिवार में अथवा तो समाज में कलह को जन्म देता है। विवाद रूपी विष की बेल काटने के लिए मौन एक प्रबल हथियार है। आवेश के क्षणों में यदि मौन रुपी औषधि का पान किया जाए तो विवाद रुपी रोग का जन्म संभव ही नहीं। आवेश के क्षणों में मौन धारण करते हुए धर्म मार्ग का आश्रय लेकर पूरे मनोयोग से मेहनत करो, यही सफलतम जीवन का सूत्र है।

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