क्या है ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर ?



ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर ऑक्सीजन सिलेंडर की तरह काम करता है। ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर एक पोर्टेबल मशीन है जिससे हवा को खींचा जाता है। इसके बाद इस हवा से नाइट्रोजन, कार्बन सहित अन्य गैसों को बाहर निकाल दिया जाता है और नजल ट्यूब या मास्क के जरिए शुद्ध ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है। यह पूरी प्रक्रिया साथ-साथ चलती है।

ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर बिजली से चलती है। इसलिए जब तक बिजली है ऑक्सीजन की सप्लाई अनवरत करती रहेगी जबकि ऑक्सीजन सिलेंडर में ऑक्सीजन खत्म होने के बाद इसे फिर से रिफिल करना होगा यानी ऑक्सीजन प्लांट पर ले जाकर सिलेंडर में फिर से ऑक्सीजन भरना होगा।

ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर दो तरह के होते हैं। एक लगातार फ्लो वाला कंसेंट्रेटर दूसरा पल्स वाला कंसेंट्रेटर। लगातार बहाव वाले कंसेंट्रेटर को जब तक बंद नहीं किया जाए तब तक एक ही फ्लो में ऑक्सीजन की सप्लाई करता रहता है जबकि पल्स वाला कंसेंट्रेटर मरीज के ब्रीदिंग पैटर्न को समझकर जितनी जरूरत होती है, उतनी ही ऑक्सीजन की सप्लाई करता है। 

ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर पोर्टेबल होता है, इसलिए ऑक्सीजन सिलेंडर के मुकाबले कहीं भी ले जाने में आसानी होती है लेकिन गंभीर मरीजों के लिए यह कारगर नहीं होता है। जो व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पहले से पीड़ित हैं और उसे यदि कोरोना हो गया है और उसे ऑक्सीजन की जरूरत है तो ऐसे मरीजों के लिए ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर प्रायः काम नहीं करेगा क्योंकि ऐसे मरीजों में कई तरह के कंप्लीकेशन होते हैं। ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर से प्रति मिनट 5-10 लीटर ऑक्सीजन की सप्लाई होती है जो कि गंभीर मरीजों के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके लिए प्रति मिनट इससे ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है। जब ऑक्सीजन सेचुरेटेड 92 प्रतिशत से नीचे आ जाए तो दोनों में से किसी एक से ऑक्सीजन की सप्लाई शुरू की जा सकती है।

दरअसल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर हवा में मौजूद अन्य गैस से ऑक्सीजन को फिल्टर करता है। हवा में तीन प्रकार की प्रमुख गैस मौजूद हैं, जिसमें करीबन 78 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन शामिल है और 1 प्रतिशत अन्य गैसें हैं। ऐसे में हमें शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए अन्य अशुद्धियों के साथ नाइट्रोजन खत्म करने की जरूरत होती है।

ऑक्सीजन कंसंट्रेटर में एक मोटर दी गई है, जिसकी मदद से यह कमरे से हवा ग्रहण करता है और उसके फिल्टर के जरिए आगे भेजता है। फिर हवा को गर्म करता है और नाइट्रोजन को खत्म करता है, ऑक्सीजन कंप्रेस होती है, फिर साफ पानी से होकर गुजरती है और आखिर में सांस लेने के लिए उपलब्ध होती है। इसे आप एक प्रकार का एयर प्यूरिफायर समझ सकते हैं, जिसमें कम्प्रेसर, मोटर्स, प्रेशर रेगुलेटर्स, हीट एक्सचेंजर और अन्य कंपोनेंट मौजूद हैं।

ऑक्सीजन कंसंट्रेटर ऑक्सीजन को बनाता नहीं है सिर्फ इसे साफ करके भेजता है। ऑक्सीजन फ्लो को लीटर प्रति मिनट (LPM) में मापा जाता है। ऐसे में आपको कम से कम एक ऐसी डिवाइस चाहिए जो कि लगातार 5LPM फ्लो से ऑक्सीजन उपलब्ध करवाए। वैसे तो मार्केट में 10LPM फ्लो वाले कंसंट्रेटर भी मौजूद हैं।

ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की हर 6 महीने में सर्विसिंग की जरूरत होती है इसके अलावा कभी-कभी फिल्टर भी साफ करने की जरूरत होती है। वहीं बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकने के लिए ह्यूमिडिफायर वाटर की बोतल में पानी को समय पर बदलना चाहिए।

वैसे तो भारत में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर आमतौर पर उन्हीं घरों में मिलता है जहां पर लोग सांस की बीमारी और अस्थमा आदि से पीड़ित होते हैं। आज के समय में कोरोनावायरस के चलते पीड़ितों का ऑक्सीजन लेवल तेजी से गिरता है तो ऐसे में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का इस्तेमाल घरों में भी किया जा रहा है।

ऑक्सीजन कंसंट्रेटर कभी भी ऑक्सीजन सिलेंडर की बराबरी नहीं कर सकता है। इन दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है। एक ऑक्सीजन सिलेंडर से किसी भी फ्लो पर तेजी से शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान की जा सकती है। इसके अलावा यह मरीज की सांस लेने की क्षमता के बावजूद फेफड़ों में ऑक्सीजन भर सकता है।

ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का इस्तेमाल करते हुए फेफड़ों की स्थिति SpO2 लेवल से ज्यादा मायने रखती है। इस डिवाइस का इस्तेमाल हल्के इंफेक्शन में किया जा सकता है और तभी यह मददगार साबित होता है। जैसे कि अगर ब्लड ऑक्सीजन या SpO2 लेवल 85 से 88 में होता है तो यह मददगार है। अगर SpO2 लेवल 85 से नीचे गया तो उसके बाद डॉक्टर की सलाह की जरूत होती है। यानी कि उसके बाद ऑक्सीजन कंसंट्रेटर काम में नहीं आता है और ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत होती है।


(निखिलेश मिश्रा)

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