पुनर्नवा केवल पौधा ही नहीं है, बल्कि समूची प्रकृति ही पुनर्नवा है


गाँव देहात में उपजने वाली एक औषधि जो जेठ के दिनों में पूरी तरह सूख जाती है, पर बरसात आने पर पुनः खिलखिला उठती है। पुनः पुनः नवीन हो उठने का गुण उसे पुनर्नवा नाम देता है। वैसे पुनर्नवा केवल वह चिरंजीवी पौधा ही नहीं है, बल्कि समूची प्रकृति ही पुनर्नवा है। जभी तो हर सूखे के बाद पुनः पुनः खिलखिला उठती है। उसे पेड़ लगाने के राजनैतिक तमाशे की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं अपनी आवश्यकता भर का जंगल उपजा लेती है।

मनुष्य केवल पेड़ों का निर्दय विनाश रोक दे तो वह सब सम्भाल लेगी। मात्र डेढ़ वर्षों की आंशिक बन्दी में ही उसने संकेत दे दिया कि मनुष्य द्वारा सैकड़ों वर्षों में पहुँचाई गयी हानि को भी वह कुछ वर्षों में ही ठीक कर सकती है। पुनर्नवा हैं हम! हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारा धर्म, हमारा राष्ट्र... एक दो नहीं, असँख्य बार क्रूर नकारात्मक शक्तियों ने हम पर प्रहार किया, पर हम हर बार पुनः उठ खड़े हुए। यहाँ यवन आये, लाखों निर्दोष मनुष्यों की हत्या की, लूट मचाई, पर हम दस वर्षों में ही पुनः खड़े हो गए।

तुर्क आये, लाखों लोगों को मारा, लाखों को दास बना कर उठा ले गए, मंदिरों और सांस्कृतिक केंद्रों तो तहस नहस कर दिया, पर हम पुनः उठ खड़े हुए। गजनवी, गोरी, खिलजी, तुगलक, लोदी,मुगल, अंग्रेज... हर बार हमने भीषण महाविनाश भोगा, पर फिर-फिर उठ खड़े हुए। हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण, ध्वंस... हर महाविनाश के बाद हमारा स्वरूप तनिक बदल गया, पर न सौंदर्य प्रभावित हुआ न शक्ति... हम सावन की बरसात में नहाए पुनर्नवा के नए हरियल पत्तों की तरह चमकते रहे,मुस्कुराते रहे। संसार में ऐसा अन्य उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा...पुनर्नवा बार बार हरा हो जाता है क्योंकि भूमि में गड़ी उसकी जड़ नहीं सूखती।

हम भी बार-बार इसी कारण उठ जाते हैं क्योंकि हमारी जड़ नहीं सूखती! हमारी जड़ों में है महाराज दिलीप की वह करुणा, जिसने उन्हें एक गाय की रक्षा के लिए सिंह को अपने शरीर का मांस देने की प्रेरणा दी थी। हमारी जड़ों में है भगवान श्रीराम की मर्यादा, जिसने उस युग के सर्वश्रेष्ठ योद्धा को राज त्याग कर चौदह वर्षों तक वन में रहने और वनवासियों की रक्षा करने की शक्ति दी थी। हमारी जड़ों में है महाराज हरिश्चन्द और मोरध्वज का त्याग, हमारी जड़ों में है महाराणा प्रताप, शिवाजी और छत्रसाल का स्वाभिमान... हमारी जड़ों में है द्रोण, कर्ण, दुर्योधन, अश्वथामा जैसे योद्धाओं के बीच में अकेले घुस कर तांडव मचा देने वाले बालक अभिमन्यु का शौर्य...

जबतक जड़ों के पास नमी रहेगी, यह पुनर्नवा संस्कृति नहीं सूखेगी। हम हर महाविनाश की अग्निपरीक्षा पार कर के निकल आएंगे। किसी भी विपत्ति के उसपार मैं रहूँ न रहूँ, आप रहें न रहें, वह रहे न रहे, 'हम' अवश्य रहेंगे। बस 'मैं' को 'हम' बनाने की आवश्यकता है, फिर विनाश का भय मिट जाएगा, जीतने की शक्ति आ जायेगी... बस स्मरण रहे कि पुनर्नवा हो तुम... तुम भिड़ गए तो तुम्हे कोई पराजित नहीं कर सकता! सभ्यताओं के इतिहास में दशक और सदी छोटी इकाई होती है, सिंधु के तट पर लगभग हजार वर्षों के बाद कभी मराठा लड़ाकों ने भगवा लहराया था, कल कोई और करेगा...


सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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