आत्महत्या!


खबर है कि जुआ में पैसा हारने के बाद भय से तेरह वर्ष के लड़के ने फाँसी लगा कर आत्महत्या कर ली लड़का किसी अच्छे प्रतिष्ठित विद्यालय का विद्यार्थी था मैं ऐसे असँख्य बच्चों को जानता हूँ जो इससे भी कम आयु के हैं और अपना परिवार चलाने के लिए कहीं दैनिक मजदूरी कर रहे हैं और हाँ! उन लड़कों ने कभी प्राइवेट स्कूल का मुँह भी नहीं देखा। 

सोच कर देखिये! 13 वर्ष की उम्र आत्महत्या की होती है क्या? तेरह वर्ष की उम्र होती है कहानियां पढ़ने की यह उम्र होती है दोस्तों के संग उछलने-कूदने की, सीखने की, हँसने-खिलखिलाने की... तेरह वर्ष का बच्चा यदि आत्महत्या कर रहा है, इसका एक ही अर्थ है कि वह पूरी तरह अकेला हो गया है उसके पास अपनी बात बताने के लिए न कोई अच्छा दोस्त है, न ही वैसे रिश्ते हैं जिनसे वह हर बात कह सके उसे इतना अकेला कौन बना गया है? यकीन कीजिये, उसे उसके धूर्त विद्यालय और मूर्ख अभिभावकों ने अकेला कर दिया है। प्राचीन काल में शिक्षा ज्ञान के लिए ली जाती थी, फिर समय आया जब शिक्षा का लक्ष्य नौकरी प्राप्त करना हो गया पर अभी शिक्षा स्टेटस सिम्बल है अधिकांश परिवार फी के नाम पर शौक से लुट रहे हैं, ताकि कह सकें कि "मेरा बच्चा शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ता है" उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि बच्चा क्या सीख रहा है, उन्हें बस यह पता है कि वे गर्व से छाती फुला कर कह सकते हैं कि हम दो लाख पर ईयर फी भरते हैं। 

दरअसल शिक्षा प्राप्त करना जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे अब हौवा बना दिया गया है बच्चों को जैसे हल में जोत दिया जा रहा है, जहाँ वे चाह कर भी किताबों से बाहर सर निकाल कर दूसरी ओर नहीं देख पा रहे हैं हम यह सोच कर खुश हो रहे हैं कि हमारा छोटा बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है। हम यह सोच कर प्रसन्न हैं कि वह कम्प्यूटर, मोबाइल वगैरह चला लेता है हमें पता भी नहीं चलता कि वह धीरे धीरे मूर्ख बन रहा है उसमें न सामाजिकता की समझ विकसित हो रही, न व्यवहारिकता की समझ हो रही है। वह न धर्म को समझ रहा है, न नैतिकता को... वह बिल गेट्स के बारे में सबकुछ जानता है, पर अपने रामगढ़ वाले मौसा के बारे में कुछ नहीं जानता  आधुनिक परिवारों के अधिकांश अभिभावक यह भूल चुके हैं कि बच्चों को समय देना भी उनका कर्तव्य है वे बच्चों को स्कूल में हाँक कर निश्चिन्त हो जाते हैं वे उसे महंगे सामान दे देते हैं, उसके लिए हर आवश्यक-अनावश्यक वस्तु खरीद देते हैं, पर समय नहीं देते। 

जीवन जीने की कला स्कूल नहीं सिखाता, यह सिखाना अभिभावक का काम है अभिभावक यदि न सिखाये तो बच्चा भले बड़ा अधिकारी बन जाये, पर कभी सुखपूर्वक जी नहीं पायेगा और यही कारण है कि आजकल अच्छे खासे सुखी सम्पन्न परिवार के लोग भी छोटी सी परेशानी से हार कर आत्महत्या कर लेते हैं। हमारी पीढ़ी तक अभिभावक बच्चों के लिए कहानियों की किताबें आदि लाते थे बच्चों के चरित्र निर्माण में उन किताबों का बड़ा महत्व होता था ऐसा नहीं है कि अब के अभिभावक उन किताबों का महत्व नहीं समझते, वे समझते हैं पर लाते नहीं हैं उन्हें लगता है कि कम्प्यूटर के युग में कहानी की किताब कहीं बच्चों को पीछे न ढकेल दे वस्तुतः वे प्राइवेट विद्यालयी शिक्षा प्रणाली के हौवे में फँस गए हैं, जो चाह कर भी अपने बच्चों को सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं। यदि ऐसी घटनाओं से बचना है तो स्कूलों पर निर्भरता छोड़ कर अपने बच्चों को समय देना ही होगा बात केवल आत्महत्या की नहीं है, यदि उसे सही तरीके से जीवन जीना न सिखाया तो आपका उच्च शिक्षित लड़का अपने जीवन में अनपढ़ लड़कों से पराजित होता रहेगा।


सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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