शिक्षित ग्रामीणों को रोजगार की गारंटी न देना मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन

लखनऊ। रोजगार प्राप्त करने का अधिकार ग्रामीण भारत के शिक्षित और अशिक्षित वर्ग को समान रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए इसके लिए अधिवक्ता विजय पाण्डेय ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कानून बनाने की मांग करते हुए कहा कि भारत एक विशाल लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी 54.3% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है l भारत की कुल जनसंख्या में 75.5% पुरुष और 62% महिलाएं शिक्षित है जबकि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 72.3% पुरुष और 56.8% महिलाएं शिक्षित हैं जो एक बहुत बड़ी संख्या है l इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रामीण भारत शिक्षा के माध्यम से रोजगार अर्जित करके सुरक्षित गरिमामय जीवन-स्तर को प्राप्त करना चाहता है, परंतु ग्रामीण भारत में शिक्षित वर्ग के लिए रोजगार की गारंटी न होने कारण संविधान प्रदत्त उनके मूलभूत अधिकारों का हनन होता है l


विजय पाण्डेय ने बताया कि भारत सरकार ने वर्ष 2005 में नरेगा अधिनियम के माध्यम से ग्रामीण भारत को रोजगार की गारंटी प्रदान की, जिसमें केवल शारीरिक-श्रम अर्थात अशिक्षित वर्ग आधारित रोजगार को ही दृष्टिगत रखा गया, जबकि शिक्षित ग्रामीण महिलाओं, पुरुषों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए श्रमिक के रूप में कार्य करना संभव नहीं था l एक तरफ ग्रामीण शिक्षितों के समायोजन की व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई दूसरी तरफ वर्ष 2009-2010 में देश में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को लागू कर दिया, इसका विस्मयकारी प्रभाव यह पड़ा कि प्रवासियों की संख्या 22 करोड़ से बढ़कर 50 करोड़ हो गई, जिसमें शिक्षित ग्रामीणों की संख्या काफी बड़ी है, इसके पीछे प्रमुख कारण है शिक्षित ग्रामीणों के लिए रोजगार की गारंटी न होना l


श्री पाण्डेय ने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को निर्देशित करता है कि वह देश के सभी नागरिकों को कार्य करने का अधिकार प्रदान करे, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार और अनुच्छेद 19 समता के अधिकार की गारंटी देता है, इन दोनों अधिकारों को प्राप्त करने के लिए रोजगार के अवसर की गारंटी को राज्य नकार नहीं सकता अर्थात राज्य रोजगार उपलब्ध कराने में शिक्षित ग्रामीण पुरुष और महिलाओं के साथ विभेद नहीं कर सकता l शिक्षित रोजगार गारंटी न होने से यह अनुच्छेद 46 के अंतर्गत  अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शिक्षित पुरुष और महिलाओं के साथ भी विभेद करता है जो उनके आर्थिक उत्थान, समता के अधिकार को प्रभावित करता है और उनके शोषण और पलायन को प्रश्रय प्रदान करता है । जिसके लिए उन्होंने मांग की कि ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित वर्ग को रोजगार गारंटी प्रदान करें जिससे संविधान प्रदत्त नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को प्राप्त किया जा सके और शहरी एवं ग्रामीण भारत में बढ़ते असंतुलन को रोंका जा सके l


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