केवल त्रिशूल पर ही हमारा ध्यान न रहे अपितु डमरू का ध्यान भी किया जाए


दैहिक, दैविक और भौतिक ये तीन तरह के शूल अथवा ताप प्रत्येक मानव के जीवन में रहते हैं। ऐसे ही भगवान शिव के साथ में अथवा हाथ में सदा त्रिशूल शोभायभान रहता है। इतना ही नहीं त्रिशूल भी है तो साथ में डमरू भी तो है। डमरू हमारे अंतः नाद का प्रतीक है। डमरू सकारात्मकता का प्रतीक है। 


जीवन है तो दुख भी है लेकिन मात्र इतना ही नहीं अपितु दुखों के साथ-साथ सुख भी अवश्य है। निर्भर हम पर करता है कि हम क्या देखना पसंद करते हैं। जीवन में प्रतिकूलता रूपी त्रिशूल है तो डमरू रुपी आनंद का वह मधुर अंतर्नाद भी है। अब माना कि हम वाह्य परिस्थितियों को नहीं बदल सकते मगर स्वयं को अथवा स्वयं की मनस्थिति को अवश्य बदल सकते हैं। 


केवल त्रिशूल पर ही हमारा ध्यान न रहे अपितु डमरू का ध्यान भी किया जाए। बस यही तो त्रिशूल और डमरू धारी भगवान शिव की मस्ती का राज है।


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