बेईमान का अन्न न खाओ, इसका असर 21 दिन रहता है


चित्र - परमहंस राममंगलदास जी महाराज


महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं:


सादे कपड़े पहनो। सच्चाई से रहो। परिवार का पालन करो। किसी से बैर न करो। सबके सुख -दुख में शामिल रहो। बेईमान का अन्न न खाओ, इसका असर २१ दिन रहता है, मरने पर नरक या प्रेत होना पड़ता है!!


तुम तकलीफ सह लो दूसरों को आराम पहुँचाओ।भिखारी दरवाजे पर आवे, उसे १ मुट्ठी भीख दो -खाली न लौट जाय। जब तुम को फुरसत हो तब आधा घन्टा जिस देवी -देवता से प्रेम हो, उसका जप करो। किसी की जीविका जाती हो तो झूठ कह दो, वैसे झूठ न बोलो। सब कुछ प्राप्त हो जाय।


बेखता, बेकसूर कोई गाली दे, तुम्हे रंज न हो, उसके हाथ जोड़ दो (अनदेखा कर दो) ।


यह भजन खुलने की कुन्जी हैं।


हममें से अधिकतर लोग तरह -तरह से भक्ति करते हैं जैसे पूजा -पाठ, कीर्तन, सत्संग -कथा इत्यादि। कुछ इसलिए की वो बुरे समय से गुज़र रहे हैं और उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर को अपनी भक्ति से प्रसन्न करके उससे दया चाहते हैं। यहाँ पर ये कहना आवश्यक है की हमारे महाराज जी ने हमें ये समझाया है की हमारा वर्तमान जैसा भी है - वो कहीं ना कहीं हमारे ही कर्मों का फल है -किसी और की वजह से नहीं (और वर्तमान बीत भी जाएगा) ।


कुछ लोग भक्ति करके, भजन करके ईश्वर से अपने और अपनों के लिए सुख- समृद्धि का आशीर्वाद चाहते हैं। और कुछ जीवन में शांति चाहते हैं …इत्यादि।


महाराज जी यहाँ पर भक्तों को उपदेश दे रहे हैं की हमारे भजन को वास्तव में असरदार करने के लिए, हमारी भक्ति का कुछ फल मिलने के लिए हमें ऊपर लिखे कर्मों को करना चाहिए।


अब महाराज जी के इन उपदेशों को देख कर हममें से कुछ लोग सोच सकते हैं कि भाई ये सब तो बहुत कठिन है, ये हमसे ना होगा।


यदि ऐसा है तो फिर मुसीबत के समय हमारी भगवान से शिकायत की वो हमारी सुनते नहीं हैं - क्या ये थोड़ा अनुचित नहीं होगा ?? विशेषकर तब जब हमारे गुरु ने हमें इस सन्दर्भ में मार्ग दिखाया हो (ऊपर) …वैसे ध्यान देने पर, या एक बार फिर से देखने से हममें से बहुत लोग पाएंगे की ये इतना कठिन भी नहीं है… यदि हमारी थोड़ी इच्छा शक्ति हो तो।


सच्चाई से रहना यदा -कदा पीड़ा दे सकता है लेकिन साथ ही साथ जीवन में काफी हद तक शांति बनाए रख सकता है- इसलिए सच का साथ देने मैं हमारा ही कल्याण है और करणीय है (worth doing)।


सबके दुःख में दुखी और सबके सुख में सुखी बनने की ईमानदार कोशिश से हम अपने अहंकार पर भी काफी हद तक अंकुश लगा पाएंगे !! तदुपरांत क्रोध कम आएगा। दूसरों से अपनी तुलना नहीं करेंगे। जीवन में शांति होगी। इसलिए ये भी करने योग्य है।


छल -कपट और बेईमानी की कमाई से हम अपना और अपनों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं - ये महाराज हमें बार -बार समझाते रहे हैं इसलिए ईमानदारी की कमाई और जो प्राप्त है वो पर्याप्त है के सिद्धांत पर चलने वालों के जीवन में सुख और शांति होती है।


थोड़ी देर के लिए ही सही पर सच्चे भाव से उस परम आत्मा (या जिस भी देवी -देवता को हम मानते हों) को याद करने से भी मन में शांति होगी। अपने सामर्थ के अनुसार, निस्वार्थ भाव से वंचितों की मदद करना - इस कर्म को तो महाराज जी ने सबसे ऊपर रखा है।


और ज़रूरी नहीं है की हम लोग इन सब उपदेशों पर एक साथ और एक ही समय पर चलना आरम्भ कर दें। वास्तव में ऐसा करना भी नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हमारा हताश होना स्वाभाविक है।


भक्ति के साथ -साथ हम इन उपदेशों पर एक -एक करके या कुछ पर चलना आरम्भ कर सकते हैं। फिर जैसे -जैसे और जितना हम महाराज जी के इन उपदेशों पर चल पाएंगे उतना ही हमारे भजन, हमारी भक्ति का हमें फल मिलने लगेगा। और हमारे महाराज जी ऐसे कर्मों के लिए हमें प्रोत्साहित तो करते ही हैं।


अर्थात भक्ति से साथ साथ ऊपर लिखे कर्मों को करना या करने की ईमानदार कोशिश से हमारा कल्याण निश्चित है - जैसे हमारे महाराज जी कहते हैं।


महाराज जी सबका भला करें।


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