जो अपने को सुख देकर, दूसरों को दुःख देते हैं -वे राक्षस हैं


चित्र - परमहंस राममंगलदास जी महाराज


महाराज जी भक्तों को समझा रहे हैं कि:


जो सबका भला चाहता, उसका भगवान भला करते हैं।
जो अपने को सुख देकर, दूसरों को दुःख देते हैं -वे राक्षस हैं।
 
जो लोग अपना और अपनों (सगे -सम्बन्धी, मित्र इत्यादि) का तो भला करते हैं, प्रायः मदद भी करते हैं लेकिन पराये - वंचितों की मदद करना तो दूर बल्कि उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, दुःख पहुंचाते हैं - महाराज जी कहते हैं ऐसे लोगों का पूजा -पाठ, भजन -कीर्तन, सत्संग सब व्यर्थ हैं !! ऐसे लोगों की भक्ति का वो सर्वशक्तिशाली परम आत्मा उन्हें लाभ नहीं देता है। हम अगर ऐसे ज़रूरतमंद लोगों की किसी भी कारणवश मदद करने में असमर्थ हैं, तो कोई बात नहीं, लेकिन उनका अपमान नहीं करना चाहिए। पाप लगता है।


जो लोग किसी भी प्रकार के अहंकार से रहित और निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करते हैं, अपने सामर्थ अनुसार (उन्हें भी, जिन्हे हम जानते तक नहीं और जो संभवतः हमारे उपकार का बदला भी ना चुका सकें), महाराज जी कहते हैं कि ऐसे लोगों की सहायता वो परम -आत्मा अवश्य करते हैं।


वैसे कितना अच्छा होता (सर्वप्रथम हमारे ही लिए), यदि हम महाराज जी के भक्त -किसी का भी बुरा ना चाहें। और सच्चे मन से सबके हित की कामना करें।


महाराज जी सबका भला करें।


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