पढ़ने-सुनने से कुछ नहीं होता जब तक कर्म न किया जाय


पढ़ने-सुनने से कुछ नहीं होता जब तक कर्म न किया जाय।
 
हममें से बहुत से लोग पूजा -पाठ करते हैं, भजन- कीर्तन करते हैं, सत्संग इत्यादि में जाते हैं। कुछ तो नियमित रूप से भी। और सब कर्मों की तरह, भक्ति के विषय में जाग्रत होने में भी हमारा ही कल्याण निहित हैं। अर्थात भक्ति के इन विभिन्न माध्यमों को करने का हमारा उद्देश्य क्या है …. इस बारे में हमें अपने आप से प्रश्न करना चाहिए ??


यदि किन्हीं सामाजिक कारणों से हम ये सब करते -करवाते हैं तो इस बात को हमें स्वीकार करना चाहिए …. स्वयं अपने आप के साथ तो अवश्य !! क्योंकि आमतौर से सामाजिक भक्ति का सच्ची भक्ति से कोई विशेष लेना -देना नहीं होता है। इनका लाभ भी क्षणिक होता है, यदि कुछ होता है तो ………..  दिखावे/ प्रचार के लिए करने वाली भक्ति प्रायः अपने अहंकार को पोषित करने के लिए भी होती है। जो ऐसा करते हैं उन्हें आगे -पीछे निराशा ही मिलेगी … जब उनके अपेक्षा अनुसार किसी ना किसी कारण से उन्हें लोकप्रियता नहीं मिलेगी।


लेकिन यदि भक्ति करने का हमारा उद्देश्य उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर के समीप जाने का है, महाराज जी की कृपा का पात्र बनने का है तो इसके लिए महाराज जी कहते हैं की हमें भजन -कीर्तन, कथा-सत्संग में निहित सन्देश के अनुसार कर्म भी करना होगा।


वास्तव में भजन करने का, कथा सुनने का, सत्संग में जाना इत्यादि -ये सब मार्ग हैं हमारा मन ईश्वर की ओर, उसकी भक्ति की ओर एकाग्रित करने का ….. जब हम इनमें निहित सन्देश को समझकर, उनके अनुसार कर्म करने का प्रयास करना आरम्भ करेंगे तो हमारा मन भी स्वतः ही एकाग्रित होना आरम्भ हो जाएगा। हमारे ऐसे प्रयासों का महाराज जी से आशीर्वाद भी मिलेगा। एक पूर्णतः (fulfilling feeling) की अनुभूति होगी….. मन को शांति मिलेगी।


वैसे इस सन्दर्भ में महाराज जी के उपदेशों पर चलने से भी हमारा मन का भक्ति में एकाग्र होना संभव है।


महाराज जी सबका भला करें।


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