पैसे से मोह की वृत्ति हो जाती है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है


चित्र - परमहंस राममंगलदास जी महाराज


महाराज जी भक्तों को समझा रहे हैं


सबको पैसा चाही, भगवान नहीं। पहले गाय भैंस का बच्चा पैदा होने पर 10-12 दिन का दूध नहीं काम में लिया जाता था। अब शुरु से ही हलवाई खोवा बना कर बेचने लगे हैं। बताओ, पेड़ा का भोग भगवान को कैसै लगे? बेईमानी की हवा चल पड़ी, नाश होने वाला है।


लाई गुड़ का भोग लगाना ठीक है।


जब पैसे का लोभ हो जाता है , पैसे से मोह की वृत्ति हो जाती है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और अविवेक घर कर लेता है। सही -गलत की समझ ही नहीं रह जाती है। और फिर कभी -कभी छल कपट से धन -संपत्ति संचित करना भी आरम्भ हो जाता है। जब इन कर्मों का फल मिलता है (और वो मिलना ही मिलना है) तो बहुत पीड़ा होती है। जो लोग ऐसा करते हैं प्रायः उनका शारीरिक और मानसिक स्वाथ्य बिगड़ जाता है।


जो लोग अपने जीवन में भौतिक -सांसारिक प्राप्ति को ऊँचा मानते हैं, पैसे को उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर से अधिक महत्त्व देते हैं -उनकी आध्यात्मिक प्रगति संभव ही नहीं है। उनमें अहंकार घर लेता है। वे उस परम -आत्मा के स्नेह और कृपा से भी वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोग महाराज जी की कृपा के पात्र हो ही नहीं सकते।


वैसे भोग के सन्दर्भ में महाराज जी ने बहुत ही अच्छी और सरल बात हमें यहाँ पर समझाई है। लाई और गुड़ से अच्छा प्रसाद हो ही नहीं सकता। मिलावट की सम्भावना बहुत कम है। जीवों के साथ अत्याचार के बिना बनता है (जैसे यहाँ पर महाराज जी पेड़े के सन्दर्भ में बता रहे हैं) और सबसे मुख्य बात महँगा भी नहीं होता।


महाराज जी और ईश्वर तो वैसे भी उनके प्रति हमारे भाव ही देखते हैं ......... ना की भोग में हमने उन्हें क्या अर्पित किया है।


महाराज जी सबका भला करें।


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