"सर्वश्रेष्ठ होने की चाह" मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण है


आप यदि मुझसे पूछें कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण क्या है तो मैं कहूंगा "सर्वश्रेष्ठ होने की चाह" मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण है। मनुष्य बेटर होना नहीं चाहता, सीधे बेस्ट होना चाहता है। उसे एक ही बार में समूचा आसमान चाहिए। वह लेखन शुरू करता है तो सीधे प्रेमचन्द को पछाड़ना चाहता है। वह मंच पर कविता पढ़ने चढ़ेगा तो सीधे कुमार विश्वास को उखाड़ फेंकने के लिए... वह जिसदिन सरगम का "सा" सीखता है उसी दिन पण्डित भीमसेन जोशी होने का स्वप्न देख लेता है। वह बेस्ट के नीचे कुछ सोचता ही नहीं, और इस चक्कर में वह न गुड रह जाता है न बेटर...


मनुष्य समझ नहीं पाता कि यहाँ बेस्ट होना सम्भव ही नहीं। आप किसी भी क्षेत्र में, कितनी भी ऊँचाई प्राप्त कर लीजिए, पर आप सबसे ऊपर नहीं पहुँच सकते। कोई न कोई आपसे ऊपर जरूर रहेगा। ईश्वर ने बेस्ट शब्द स्वयं के लिए ही रिजर्व रखा है।


जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका यही है कि हम गुड से बेटर की यात्रा करें। यह यात्रा हमें वह सबकुछ दे देती है जो हमारे लिए बना है। पद, प्रतिष्ठा, वैभव, धन के साथ साथ मानसिक शान्ति और बौद्धिक समृद्धि भी... और क्या चाहिए?


मनुष्य अपनी गलतियों को सहजता से स्वीकार नहीं करता। वह हर बार जिद्द पकड़ लेता है कि मैं ही सही हूँ। मनुष्य यदि अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीख ले तो वह बड़ी आसानी से उन्हें सुधार कर रोज स्वयं में सार्थक बदलाव ला सकता है। यही बदलाव उसे रोज पहले से बेहतर बनाता जाएगा। यही तो है गुड से बेटर की यात्रा...


वैसे सच पूछिए तो बेस्ट होने की चाह मनुष्य को पीड़ा के अतिरिक्त और कुछ नहीं देती। पीड़ा, कुंठा, अवसाद...  अधिकांश लोग तो अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ होने के लिए बुरा मार्ग पकड़ लेते हैं। आगे वे सर्वश्रेष्ठ तो हो नहीं पाते, और इस चक्कर में हजार कमजोरियां और पाल लेते हैं।


आदमी सर्वश्रेष्ठ होने के लिए दूसरों को चोट पहुँचाने लगता है। वह लम्बा दिखने के लिए दूसरों के पैर तोड़ने का प्रयास करता है, नीचा दिखाने के लिए उनका अपमान करता है। और यदि यह सब नहीं कर पाता तो मन ही मन कुढ़ता रहता है, गाली देता रहता है। आप अपने आसपास देखेंगे तो ऐसा कोई न कोई उदाहरण मिल ही जायेगा। पर क्या यह सब कर के आदमी सर्वश्रेष्ठ हो पाता है? नहीं न?


यदि कोई व्यक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ लेखक/कवि समझता है, इसका अर्थ यह है कि उसने उसने अधिक पढ़ा नहीं। कोई स्वयं को सर्वश्रेष्ठ गायक समझता है, इसका सीधा अर्थ है कि उसने अधिक सुना नहीं। जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ कलाकार माने इसका अर्थ है कि उसने अभी बुजुर्गों की कलाकारी देखी नहीं। कोई स्वयं को सर्वश्रेष्ठ विद्वान समझता हो, तो इसका अर्थ यही है कि वह कभी विद्वानों से मिला नहीं। सर्वश्रेष्ठ होने के भरम का यही एकमात्र कारण होता है।


मैं कभी समझ नहीं क्यों पाता कि हमें बेस्ट होना ही क्यों है? वह क्या है जो केवल बेस्ट होने पर ही मिलता है? ऐसा कुछ भी तो नहीं। आप एक चीज भी नहीं बता सकते जो केवल बेस्ट को मिलती हो... हां, मिलता है तो सर्वश्रेष्ठ होने का घमण्ड। पर यह घमण्ड अंततः नाश ही कराता है। फिर क्या लाभ इसे पाने से?


बेहतर है कि हम रोज से श्रेष्ठ होने की ओर कदम बढ़ाते रहें। छोटे से जीवन मे जितना आगे पहुँच सकते हैं, पहुँच ही जायेंगे। यही बहुत है, पूर्ण है...


(सर्वेश तिवारी श्रीमुख)


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