ये संसार भोगने की भूमि है, सभी को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है


संसार भोगने की भूमि है, सभी को कर्म का फल भोगना पड़ता है। जो अपने इष्ट देव पर दृढ़ता से आरुढ़ है, वह संसारी कष्टों को हंसते-हंसते सहन कर लेते हैं। भगवान का जीव है, भगवान का शरीर है- इस वाक्य का ज्ञान होते हुए, हमेशा मन में बल पैदा होता रहता है।


वो परम आत्मा हमें इस संसार में भेजता है (माँ की कोख से जन्म लेकर) अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोगने के लिए - जिन कर्मों का फल हमें तब नहीं मिल पाया था और ये चक्र ऐसे ही चलता रहता है जब तक हम इससे समाप्त करने का निश्चय ना कर ले। इस जन्म के उद्देश्य के लिए कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हमें ये पूर्व जन्म की गलतियां सुधारने के लिए मिलता है। हालांकि ये बात पूर्ण नहीं होगी क्योंकि हमें इस जन्म में अपने पूर्व जन्म के बचे हुए अच्छे और बुरे -दोनों कर्मों का फल पाते हैं
अब ये अलग बात है की जीवन के संघर्षों से जूझते -जूझते, हममें से बहुत से लोगों को लगने लगता है की कुल मिलाकर हमारे जीवन में दुःख अधिक हैं, सुख की तुलना में अर्थात जीवन में प्रतिकूल परिश्थितियां कहीं अधिक मिलती हैं, अनुकूल परिशतियों की तुलना में लेकिन ये सब परिस्थितियां हैं हमारी ही कियी -धरी, हमारे ही कर्मों का फल हैं, अधिकतर इसी जन्म के और कुछ पूर्व जन्म के भी  और इनको झेलने से कोई भी बच नहीं सकता - ये निश्चित है।


महाराज जी तभी हमें यहाँ पर संभवतः समझा रहे हैं की ये संसार भोगने की भूमि है - सभी को अपने -अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इस पूरी व्यवस्था को बनाने वाला, नियंत्रित करने वाला वो परम आत्मा है, भगवान है, ईश्वर है, ब्रम्ह है या जो भी नाम अथवा अवतार हमें अच्छा लगें या जिनको हम अपना इष्ट मानते हैं वो मान सकते हैं वास्तव में है वो एक ही
ये हमारा शरीर जो पांच तत्वों से बना हुआ है या कुछ लोग ये भी कहते हैं की मिटटी का बना हुआ है, ये है तो उस परम आत्मा की ही रचना और इस शरीर के अंदर जो आत्मा है (हम हैं), वो तो है ही उस परम आत्मा का अंश (आत्मा के निकल जाने के बाद शरीर को मिटटी कहते भी हैं) तो जब हमारा पूरा अस्तित्व ही उस परम आत्मा से है और हम उस परम आत्मा की बनाई व्यवस्था में जी भी रहे हैं जिसमें इस संसार के हर मनुष्य को उसके अच्छे और बुरे कर्मों का फल मिलता ही मिलता है, तो बुद्धिमानी तो इसी में है की हम बुरे कर्म करने से जहाँ तक हो सके बचें -जिससे की ऐसे कर्मो का बुरा फल भी वो परम आत्मा हमें ना दे हमारे महाराज जी अधिकतर उपदेश भी इसी सन्दर्भ में हैं और यदि हमने मूर्खता में, जाने -अनजाने में, काम - मोह- लोभ- अहंकार (क्रोध) इत्यादि में दूसरों को दुःख दिया है, बेईमानी से धन -संपत्ति कमाई है तो हमें ये भी में याद रखना है की इसका फल हमें वो परम आत्मा देगा ही देगा - अपने ही तरीके से वो सर्वज्ञ है - सब जानता है- सब देख रहा है - सबको देख रहा है, सर्वव्यापी है - इस संसार में वो सब जगह है, हर चीज़ में है और सर्वशक्तिशाली तो है ही - कहीं भी, कभी भी और किसी के साथ कुछ भी कर सकता है।


कर्मों के फल के रूप में हाँ यदि हमें अपने किये पर वाकई में पछतावा होता है, क्षमा प्रार्थी हैं तो संभव है की वो परम आत्मा हमारे बुरे कर्मों के भोग की तीव्रता कम कर दे वो परम आत्मा बहुत दयालु है वो हमारे सच्चे भाव का भूखा है, सच्ची भक्ति, सच्चे प्रेम का भूखा है (हमारे प्रसाद, चढ़ावे दिखावे की भक्ति का नहीं) कभी कभी ऐसी परिस्थिति में वो परम आत्मा हमारे कर्मों के भोग भोगने में हमारे साथ भी  होता है -फिर तो भोग काटना आसान हो जाता है सब उसके लिए हमारे भाव का खेल है
हमने उस परम आत्मा को देखा तो नहीं है (संभवतः कुछ ने महसूस किया है) लेकिन उस परम आत्मा के बन्दे (हमारे महाराज जी) को हमने अपना गुरु माना है, कुछ के लिए हमारे महाराज जी उस परम आत्मा के अवतार हैं तो कुछ के लिए स्वयं परब्रम्ह हैं।  हमारे महाराज जी हमें सच्चे परमार्थ का और परस्वार्थ का मार्ग दिखाते रहते हैं क्योंकि केवल इसी मार्ग से हम उस परम आत्मा के समीप जा सकते हैं- यदि महाराज जी का आशीर्वाद मिल जाये तो साथ ही साथ महाराज जी अपने सच्चे भक्तों के प्रारब्ध काटने में कुछ ना कुछ लीला करके मदद भी करते हैं और एक सार्थक जीवन जीने का मार्ग दिखाते रहते हैं अब उस पर चलना या ना चलना हमारे ऊपर है
महाराज जी सबका भला करें।


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