जो ईर्ष्या करता है, सबसे अधिक वही उसकी अग्नि में जलता है


महाराज जी भक्तों को समझा रहे हैं:-


औरन को देखत, भई जिसकी शीतल छाती। जन्म सफल है उसका, प्रभु है उसके साथी॥


हम लोग कुछ दिनों पहले चर्चा कर रहे थे कि स्वयं से प्रेम करना अच्छी बात है। दूसरों से अपेक्षा करने के पहले हमें स्वयं अपना ध्यान रखना चाहिए परन्तु जब स्वयं से अधिक मोह होने लगता है तो हम दूसरों से अपनी तुलना करते हुए, ईर्ष्या करने लगते हैं और तब समस्या खड़ी होने लगती है, सर्वप्रथम हमारे ही साथ। उसके पास इतनी धन-संपत्ति है और मेरे पास नहीं है, उसका घर कितना बड़ा है मेरा तो नहीं है, वो कितनी सुन्दर है मैं नहीं हूँ, वो कितना बलवान है मैं नहीं हूँ, वो ऊँचें ओहदे पर काम करता/करती है और मैं नहीं, आजकल के दौर में उसको इतनी लाइक्स मिलते हैं मुझे नहीं …. ऐसी सूचि अंतहीन हो सकती है।


और फिर इन परिश्थितियों में कभी- कभी हम दूसरों के बुरे की कामना करने लगते हैं !! ये गलत है। कुछ जगह तो ऐसी सोच को पाप की श्रेणी में भी रखा गया है और यदि ऐसी सोच में रस आने लगे तब तो ये पाप ही है, जिसका फल वो सर्वज्ञ परम आत्मा हमें आगे -पीछे देगा ही देगा जिससे हमें कष्ट हो सकता है। जिससे हम ईर्ष्या कर रहे होते हैं उसे तो कोई अंतर नहीं पड़ता। कभी -कभी तो उसे पता भी नहीं होता …और जो ईर्ष्या करता है - सबसे अधिक वही उसकी अग्नि में जलता है।


विचारों को आने से हम रोक नहीं सकते। परन्तु ऐसे तुलनात्मक विचार आने पर हम उन्हें नकार सकते हैं, अपने आप को याद दिला सकते हैं की महाराज जी के उपदेश अनुसार हम सब अपना -अपना भाग्य लेकर आये हैं, जो हमारे ही द्वारा किये गए पूर्व कर्मों पर आधारित हैं। हम अपने भाग्य का खाते हैं और दूसरा उसके भाग्य का …फिर तो दूसरों से तुलना करना ही गलत है। बाकी सब हमारे प्रयत्नों पर निर्भर करता है, जैसे हमारे कर्म होंगे वैसे ही वो सर्वयापी परम आत्मा हमें फल देगा।


फिर हम ये भी जानते हैं की जीवन में हम सब अपनी कोई ना कोई लड़ाई लड़ रहे हैं। हो सकता है जिससे हम ईर्ष्या कर रहे हों वो भी अपने जीवन में कोई संघर्ष कर रहा हो जिसका हमें पता ही ना हो फिर किसी से ईर्ष्या क्यों करनी, किसी का बुरा क्यों सोंचना ?? इसलिए जो हमें ईश्वर से प्राप्त हुआ हुआ है उस में संतुष्ट रहने में ही हमारा हित है। कहते हैं ना- जो प्राप्त है वो पर्याप्त है।


महाराज जी यहाँ पर कहते हैं कि दूसरों की सफलता पर, उनकी खुशियों में ह्रदय से जो आनंदित होते हैं (ये संभव है- अगर इच्छा शक्ति हो तो), उनका जीवन सफल हो जाता है। ऐसे लोग अपने दुःख- सुख में उस सर्वशक्तिशाली परम आत्मा को प्रायः अपने समीप पाते हैं। उनके लिए अपना प्रारब्ध काटना आसान हो जाता है। उनके जीवन में शांति आती है और महाराज जी का आशीर्वाद भी मिलता है।और भला हमें अपने जीवन में क्या चाहिए हो सकता है।


महाराज जी सबका भला करें।


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