त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार होने के कारण कार्तिक पूर्णिमा को "त्रिपुरी पूर्णिमा" भी कहते हैं


कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा 30 नवंबर सोमवार को पड़ रही है हालांकि पूर्णिमा तिथि 29 नवंबर की दोपहर 12.47 से ही शुरू हो जायेगी। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा, गंगा स्नान, देव दीपावली आदि नामों से भी जाना जाता है। इस महापुनीत पर्व पर दीप दान का विशेष महत्व बताया गया है।


शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेवजी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था। इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन यदि कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी होने से विशेष फल देती है। लेकिन रोहिणी होने पर इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन क्षीर सागर दान का अनन्त माहात्म्य है। क्षीर सागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल मनाया जाता है।


इस दिन किया हुआ दान, होम और जप अक्षय फल देने वाला माना गया है। 'अतो देवाः' आदि दो मंत्रों से देवों के देव भगवान श्रीविष्णु तथा अन्य देवताओं की प्रसन्नता के लिए अलग-अलग तिल और खीर की आहुति छोड़ें। फिर यथाशक्ति दक्षिणा दें और उन्हें प्रणाम करें। इसके बाद भगवान श्रीविष्णु, देवगण तथा तुलसी का पुन: पूजन करें। क्षमायाचना करके ब्राह्मणों को प्रसन्न करने के पश्चात उन्हें विदा करें और गौ सहित भगवान श्रीविष्णु की सुवर्णमयी प्रतिमा आचार्य को दान कर दें। तत्पश्चात भक्त पुरुष गुरुजनों के साथ स्वयं भी भोजन करे। संपूर्ण व्रतों, तीर्थों और दानों से जो फल मिलता है, वही इस कार्तिक व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से करोड़ गुना होकर मिलता है।


पर्व का महत्व


ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य ने इसे महापुनीत पर्व की संज्ञा दी है। इसीलिए इसमें किये हुए गंगा स्नान, दीप दान, होम, यज्ञ तथा उपासना आदि का विशेष महत्व है। इस दिन कृतिका पर चंद्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो पद्मक योग होता है, जो पुष्कर में भी दुर्लभ है। इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुनर्जन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनसूया और क्षमा− इन छह कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए।


पूजन से होने वाले लाभ


कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में नक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवपद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से संपत्ति बढ़ती है। इस दिन उपवास करके भगवद् स्मरण एवं चितन से अग्निष्टोम के समान फल होता है तथा सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। इस दिन स्वर्ण के मेष दान करने से ग्रह योग के कष्टों का नाश होता है। इस दिन कन्यादान करने से संतान व्रत पूर्ण होता है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।


कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा


एक बार त्रिपुर राक्षस ने एक लाख वर्ष तक प्रयागराज में घोर तप किया। इस तप के प्रभाव से समस्त जड़ चेतन, जीव तथा देवता भयभीत हो गये। देवताओं ने तप भंग करने के लिए अपसराएं भेजीं, पर उन्हें सफलता न मिल सकी। आखिर ब्रह्माजी स्वयं उसके सामने प्रस्तुत हुए और वर मांगने का आदेश दिया। त्रिपुर ने वर में मांगा, ''न देवताओं के हाथों मरूं, न मनुष्य के हाथों।'' इस वरदान के बल पर त्रिपुर निडर होकर अत्याचार करने लगा। इतना ही नहीं, उसने कैलाश पर भी चढ़ाई कर दी। परिणामतः महादेव तथा त्रिपुर में घमासान युद्ध छिड़ गया। अंत में शिवजी ने ब्रह्मा तथा विष्णु की सहायता से उसका संहार कर दिया। तभी से इस दिन का महत्व बहुत बढ़ गया।


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