जो मौत और भगवान को भूले हैं, मनमानी करते हैं

 

चित्र - परमहंस राममंगलदास जी महाराज


महाराज जी उपदेश दे रहे हैं:

मन बदमास है। मान- अपमान, क्रोध- कसाई, छल- कपट, बैर, हृदय में रहने से पूजा-पाठ,  भजन सब जुर्माना में कट जाता है। तुम अपने मन की मानती हो। किसी की और हम जो बताते -उस पर नहीं चलती हो। रोने से आंखें दुखी रहने से शरीर और खराब हो जावेगा। जो मौत और भगवान को भूले हैं, मनमानी करते हैं। सत्य के बराबर कोई तप नहीं, दया भीतर से रखने के बराबर कोई धर्म नहीं।

वाकई में महाराज जी यहाँ पर हमारे दुखों के मूल कारणों को कितना सरल तरीके से व्याख्या कर रहे हैं -जो की स्त्री और पुरुष दोनों पर लागू होता है।

हम लोग दूसरों के लिए अपने ह्रदय में बैर रखकर या अपने किसी ना किसी अहंकार (जिनकी व्याख्या हम इस पटल पर समय -समय पर करते हैं) से ग्रसित होकर, क्रोधवश अपने- परायों को दुःख देते हैं, इतना की कभी -कभी उनकी आँखों में आंसू आ जाएं। छल -कपट करके धन -संपत्ति संचित करते हैं। 

ये सब करते समय हम भूल जाते हैं को वो सर्वव्यापी परमात्मा सब देख रहा है। 

साथ ही साथ हम मंदिर जाते रहते हैं, भजन- कीर्तन करते रहते हैं, सत्संग करते हैं । कुछ लोग तो ये भी सोचते हैं ये सब करने से, उनके ही द्वारा किये गए बुरे कर्मों का असर उनपर नहीं होगा। पर जैसा महाराज जी ने समझाया है ये संभव नहीं है।

और ये सब तब, जब महाराज जी हमें निरंतर ऐसे कर्म ना करने को समझाते रहते हैं। इस सन्दर्भ में उनके उपदेश सरल हैं (इस पेज की दूसरा announcement/घोषणाएं) - करने योग्य भी हैं। लेकिन दुर्भग्यवश हममें से बहुत से लोग महाराज जी के उपदेशों को भूलकर अपनी मन- मानी करते हैं। बुरे कर्म करते हैं जैसे कुछ का वर्णन ऊपर किया गया है।

फिर वो सर्वशक्तिशाली परमात्मा हमारे ऐसे बुरे कर्मों का फल उसके ही द्वारा निर्धारित समय पर, उसके ही बनाये रूप में जब हमें देता है (इससे कोई बच नहीं सकता है, कोई भी नहीं) तो हमें रोना आ सकता है - कभी कभी उससे कहीं अधिक जैसा हमने  दूसरों को दिया होगा। हमें तकलीफ भी हो सकती है, इतनी की कभी -कभी तो हमारे शरीर को हानि पहुँच जाए।

तो फिर ऐसी परिस्थिति से हम अपने आप को कैसे बचा सकते हैं ???

चैतन्य रहकर,

अपने चाल -चलन, अपने व्यव्हार पर जागरूक रहकर,

ये चिंतन करके की जो कर्म हम कर रहे हैं, वो क्यों कर रहे हैं -उसके फल के बारे में सोचकर।

महाराज जी की उस बात को समय समय पर याद दिलाते हुए की ईश्वर सब कुछ देख रहा है।

यही हम सचेत रहकर ऊपर लिखे इन चरणों (steps) को करने का संकल्प ले और फिर उनका अभ्यास करें तो बहुत संभव है की हम वो बुरा कर्म ही ना करें जो हम करने जा रहे हों। फिर उनका फल भी भोगना नहीं पड़ेगा। महाराज जी के भक्त धैर्यपूर्वक ऐसी कोशिश तो कर ही सकते हैं, अपने ही भले के लिए।

महाराज जी यहाँ पर सत्य का साथ ना छोड़ने पर भी बल दे रहे हैं। ये ध्यान में रखते हुए की असत्य थोड़े समय के लिए ही छुपा रह सकता और जब वो सामने आता है तो हमारे साथ, हमारे अपनों को भी दुःख पहचाता है। 

दूसरों के लिए दया की भावना रखना और मुसीबत में फंसे अपनों की, और विशेषकर परायों की, क्षमता अनुसार मदद करना - महाराज जी कहते हैं इससे बड़ा धर्म तो कोई हो ही नहीं सकता। हमारे ऐसे अच्छे कर्मों को भी वो सर्वज्ञ परमात्मा देखता है , जानता है और जब वो इनका फल हमें देता है, तो हमें जीवन में सुख की प्राप्ति होती है, शांति मिलती है।

महराज जी सबका भला करें।

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