"शिव" परमात्मा रचयिता हैं और "शंकर" उनकी एक रचना


शिव जी, शंकर जी में अंतर तथा इनसे विषधर सर्प का सम्बन्ध:

भगवान शंकर के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है वासुकी। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम क‌िया था ज‌िससे सागर को मथा गया था।

कहते हैं क‌ि वासुकी नाग शंकर जी के परम भक्त थे। इनकी भक्त‌ि से प्रसन्न होकर शंकर जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना द‌िया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांत‌ि ल‌िपटे रहने का वरदान द‌िया। पुराणों अनुसार सभी नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप की पत्नि कद्रू के गर्भ से हुई है। कद्रू ने हजारों पुत्रों को जन्म दिया था जिसमें प्रमुख नाग थे- अनंत (शेष),वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, पिंगला और कुलिक। कद्रू दक्ष प्रजापति की कन्या थीं।

शंकर जी के बारे में कहा जाता है कि भगवान शंकर श्मशान में निवास करते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं और गले में नाग को धारण करते हैं। भगवान शंकर के गले में लिपटा नाग इस बात का संकेत है कि भले ही कोई जीव कितना भी जहरीला क्यों न हो, पर्यावरण संतुलन में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान है।

योग विज्ञान में, सर्प कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। यह आपके भीतर की वह उर्जा है, जो सुप्तावस्था में पड़ी है और इस्तेमाल नहीं हो रही है। शिव जी के साथ सर्प इस बात का प्रतीक है कि इंसान अगर अपनी भीतर की उर्जा यानि कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर ले तो वो भी शिवत्व को प्राप्त हो सकता है। सांप एक जमीन पर रेंगने वाला जीव है। मगर शिव लिंग को भी सर्प घेरे रहता है। इससे यह पता चलता है कि आत्मा हो या परमात्मा कुंडलिनी शक्ति ही सर्वोपरि है।

सांप शंकर जी के गले के चारों ओर लिपटा रहता है। इसके पीछे एक तर्क भी है। ऊर्जा शरीर में 114 चक्र होते हैं। हम उन्हें 114 संधि स्थलों या नाडिय़ों के संगम के रूप में देख सकते हैं। इन 114 में से आम तौर पर शरीर के सात मूल चक्रों के बारे में बात की जाती है। इन सात मूल चक्रों में से, विशुद्धि चक्र हमारे गले के गड्ढे में मौजूद होता है। यह खास चक्र सांप के साथ बहुत मजबूती से जुड़ा होता है। शंकर जी का केंद्र विशुद्धि चक्र में है। उन्हें विषकंठ या नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि वह सारे जहर को छान लेते हैं और उसे अपने शरीर में प्रवेश नहीं करने देते।

एक बात और, वह यह कि प्रायः शिव और शंकर को समान समझा जाता है जबकि यह सही नही है। शिव का तारतम्य शिवलिंग यानी एक बिंदु से है जबकि शंकर रूप का तारतम्य उस रूप से है जिसमे चन्दन, त्रिशूल, नाग और गंगा की छवि प्रदर्शित की जाती है। विषधर सर्प शिवलिंग रूप और शंकर रूप दोनों के साथ प्रदर्शित किए जाते है जबकि शिवलिंग को ब्रह्मांड पुंज के रूप में भी मान्यता है।

अज्ञान के कारण बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम मानते हैं। परंतु दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को सदा तपस्वी मूर्त दिखाया जाता है और कई तस्वीरों में शिवलिंग का ध्यान करते हुए भी दिखाते हैं। परमात्मा शिव की स्थापना, पालना और विनाश के लिए ब्रह्मा विष्णु और शंकर तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना करते हैं जिनमें शंकर के द्वारा विनाश का कार्य ही कराते हैं। शिव परमात्मा रचयिता हैं और शंकर उनकी एक रचना हैं। शिव ब्रह्म लोक में परमधाम के निवासी हैं और शंकर सूक्ष्म लोक में रहने वाले हैं। शिव की यादगार में शिवरात्रि मनाई जाती है ना कि शंकर रात्रि। अतः शिव निराकार परमात्मा हैं और शंकर सूक्ष्म आकारी देवता है।

शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है तो कहते हैं शिव शंकर भोलेनाथ। शंकर जी को ऊँचे पर्वत पर तपस्या में लीन बताते हैं जबकि भगवान शिव ज्योति बिंदु स्वरूप हैं। जिनकी पूजा ज्योति र्लिंग के रूप में की जाती है। वास्तव में भगवान शिव के तीन प्रमुख कर्तव्य हैं। नई पावन दैवीय सतयुगी दुनिया की स्थापना, दैवीय दुनिया की पालना और पुरानी पतित दुनिया का विनाश। 

इसलिए भगवान शिव को गाॅड कहा जाता है। ये तीनों कर्तव्य तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारा करवाए जाते हैं। इसलिए शिव की त्रिमूर्ति शिव भगवान भी कहा जाता है। भगवान शिव सदा कल्याणकारी हैं, जन्म-मरण के चक्र या बंधन से सदा मुक्त हैं जबकि शंकर साकारी देवता है।

शंकर को ही देव आदि देव महादेव भी कहा जाता है। भगवान शिव शंकर जी में प्रवेश करके वे कार्य करवाते हैं जो किसी अन्य देवी-देवता, साधु, संत, महात्मा द्वारा सम्भव नही होता।


निखिलेश मिश्रा

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