बुजुर्गो के नुस्खे में लौंग

 


लौंग को दादी नानी के नुस्को में एक विशेष स्थान प्राप्त है। लौंग (Clove, Lawang, Devkusum) का प्रयोग मसाले के तौर पर प्राचीन काल से होता चला आ रहा है। अलग-अलग स्थानों एवं भाषाओं में लौंग को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। लौंग को अंग्रेजी में क्लोव्ह / clove कहा जाता है जो कि लैटिन के शब्द clavus, जिसका अर्थ नाखून होता है, का अंग्रेजी रूपान्तर है। लौंग के नाखून के सदृश होने के कारण ही उसका यह अंग्रेजी नाम पड़ा। लौंग का रंग काला  होता है। यह एक खुशबूदार मसाला है। जिसे भोजन में स्वाद के लिए डाला जाता है। लौंग का उद्गम स्थान इंडोनेशिया को माना जाता है। 

ऐतिहासिक रूप से लौंग का पेड़ मोलुक्का द्वीपों का देशी वृक्ष है, जहाँ चीन ने ईसा से लगभग तीन शताब्दी पूर्व इसे खोजा और अलेक्सैन्ड्रिया में इसका आयात तक होने लगा। आज जंजीबार लौंग का सबसे अधिक उत्पादन करने वाला देश है। लौंग का अधिक मात्रा में उत्पादन जंजीबार और मलाक्का द्वीप में होता है। इसका उपयोग भारत और चीन में 2000 वर्षों से भी अधिक समय से हो रहा है। लौंग का उत्पादन मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मेडागास्कर, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों में होता है। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य हो कि अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में लौंग का मूल्य उसके वजन के सोने के बराबर हुआ करता था।

लौंग में कई औषधीय तत्वों से भरपूर है। इसका उपयोग सर्दियों के मौसम में ज्यादा किया जाता है, क्योंकि लौंग की तासीर बहुत गर्म होती है। यह एक सदाबहार पेड़ है। खास बात है कि इसका पौधा एक बार लगाने के बाद कई सालों तक चलता है। देश के सभी हिस्सों में लौंग की खेती होती है, लेकिन इसकी खेती तटीय रेतीले इलाकों में नहीं हो सकती, तो वहीं इसकी सफलतापूर्वक खेती केरल की लाल मिटटी और पश्चिमी घाट के पर्वत वाले इलाके में हो सकती है। 

लौंग की खेती को उष्णकटिबंधीय जलवायु में किया जाता है। इसके पौधों को बारिश की जरूरत पड़ती है। साथ ही इसके पौधे तेज़ धूप और सर्दी को सहन नहीं कर पाते हैं। इससे पौधों का विकास रुक जाता है, इसलिए इसके पौधों को छायादार जगहों की ज्यादा जरूरत पड़ती है।  इसके अलावा सामान्य तापमान में पौधों का विकास अच्छे से होतो है। अगर गर्मियों का मौसम है तो अधिकतम 30 से 35 तापमान पहना चाहिए। अगर सर्दियों का मौसम है तो न्यूनतम 20 तापमान होना चाहिए। इसकी खेती के लिए नम कटिबंधीय क्षेत्रों की बलुई मिट्टी अच्छी होती है। लौंग के पौधों के लिए जल भराव वाली मिट्टी में नहीं उगा सकते है इससे पौधा खराब हो जाता है।

लौंग के बीज को तैयार करने के लिए माता पेड़ से पके हुए कुछ फलों को इक्कठा किया जाता है। इसके बाद उनको निकालकर रखा जाता है। जब बीजों की बुआई करनी हो, तब पहले इसको रात भर भिगोकर रखें, इसके बाद बीज फली को बुआई करने से पहले हटा दें।

बीजों की रोपाई नर्सरी में जैविक खाद का मिश्रण तैयार करें। अब मिट्टी में करीब 10 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियां में करनी चाहिए। इसके बीजों से पौध तैयार होने में करीब दो साल तक का समय लगता हैं और उसके चार से पांच साल बाद पौधा फल देना शुरू करता है। इस तरह पैदावार करीब 7 साल में मिलती है, इसलिए किसान भाई पौधों को नर्सरी से खरीदकर भी खेतों में लगा सकते हैं। इससे समय की बचत होती है। साथ ही पैदावार भी जल्द मिलती है। जब नर्सरी से पौधा खरीदते है, तो पौधा करीब चार फिट से ज्यादा लम्बाई और दो साल पुराना हो।

लौंग के पौध का रोपण मानसून के वक्त किया जाता है। पौध रोपण का समय करीब जून से जुलाई के महीने में करना चाहिए। पौधे को रोपने के लिए करीब 75 सेंटीमीटर लम्बा, 75 सेंटीमीटर चौड़ा और 75 सेंटीमीटर गहरा एक गड्डा खोदकर तैयार कर लें। एक गड्डे से दूसरे गड्डे की दूरी करीब 6 से 7 सेंटीमीटर हो। इन गड्डे में खाद, हरी पत्तियां  और पशु खाद से भर दें। इन सभी खादों को मिटटी की एक परत से ढके।

लौंग की खेती में करीब 3 से 4 साल में सिंचाई की जरूरत होती है। गर्मियों के मौसम में फसल में लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए, जिससे भूमि में नमी बनी रहे।

लौंग के पौधे करीब 4 से 5 साल में फल देना शुरुर कर देते है। इसके फल पौधे पर गुच्छों में लगते हैं। इनका रंग लाल गुलाबी होता है। जिनको फूल खिलने से पहले ही तोड़ लिया जाता है। इसके फल की लम्बाई अधिकतम दो सेंटीमीटर होती है। जिसको सुखाने के बाद लौंग का रूप दिया जाता है।

लौंग के फूल कलियों को हाथ से अलग करके सबखने के लिए फैला दिया जाता है। जब कली के भाग काले भूरे रंग का हो जाये, तो उन्हें इक्कठा कर लिया जाता है। जिसके बाद लौंग का वजन थोडा कम हो जाता है।

लौंग की खेती से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। बाजार में इसकी कीमत अधिक होती है। इसलिए यह मंहगा बिकता है। लौंग के पौधे रोपाई के करीब 4 से 5 साल बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं। वैसे इनसे शुरुआत में पैदावार कम मिलती है, लेकिन जब पौधा पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है, तब एक पौधे से एक बार में करीब तीन किलो के आसपास लौंग प्राप्त होने लगता है।

आज से क़रीब तीन हज़ार साल पहले लौंग सिर्फ़ पूर्वी एशिया के कुछ द्वीपों पर हुआ करती थी। इस द्वीप का नाम है टर्नेट। ये द्वीप प्रशांत महासागर में स्थित है और आज इंडोनेशिया का हिस्सा है। कहा ये भी जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना लौंग का पेड़ टर्नेट में ही है।

आप टर्नेट की सैर पर जाएंगे तो वहां के लोग और गाइड आपको उस पेड़ का नाम बताएंगे और उसे दिखाने ले जाएंगे। कई बार वो दूसरे पेड़ दिखाकर आपको झांसा भी दे सकते हैं, मगर टर्नेट की सिर्फ़ यही ख़ूबी नहीं कि यहां सबसे पहले लौंग का पेड़ उगा था। ये क़ुदरती तौर पर बेहद दिलचस्प जज़ीरा है। इस द्वीप के ज़्यादातर हिस्से में ज्वालामुखी का राज है।

एक छोटा सा हिस्सा है जहां पर एक शहर बस गया है। वहीं पर सैलानियों के आने-जाने के लिए एक हवाई पट्टी बना दी गई है। समुद्र के नज़ारे का लुत्फ़ लेने के लिए बीच भी है। आप जब टर्नेट जाएंगे तो हो सकता है कि इसके आसमान पर ज्वालामुखी की राख उड़ती दिखाई दे। यहां के लोग भी मेहमान नवाज़ हैं। औरत हो या मर्द, सबका स्वागत हैलो मिस्टर कहकर ही किया जाता है।

टर्नेट, इसके पास स्थित टिडोर और उसके आस-पास के कुछ द्वीप ही ऐसे इलाक़े थे जहां आज से तीन चार हज़ार पहले से लौंग के पेड़ पाए जाते थे। लौंग के कारोबार से इन द्वीपों के बाशिंदों की ज़िंदगी आराम से बसर होती थी।

लेकिन जब टर्नेट के सुल्तानों के पास लौंग के कारोबार से काफ़ी दौलत आ गई, तो वो ख़ुद को कुछ ज़्यादा ही ताक़तवर समझने लगे। टर्नेट के सुल्तानों ने फिलिपींस और पापुआ न्यू गिनी तक अपना दावा ठोकना शुरू कर दिया। टर्नेट और टिडोर के सुल्तानों के बीच जंग छिड़ गई।इसका फ़ायदा अंग्रेज़ और डच कारोबारियों ने उठाया और इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया। कई सदियों तक ये द्वीप यूरोपीय देशों के उपनिवेश रहे। अपनी क़ुदरती ख़ूबसूरती के लिए मशहूर इन द्वीपों पर कई तरह के जीव-जंतु भी पाए जाते हैं।

उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वॉलेस जब, नई नस्लों की खोज में पूर्वी एशिया में भटक रहे थे। तो, उन्होंने कुछ वक़्त टर्नेट द्वीप पर भी बिताया था।

यहां रहने के दौरान ही वॉलेस बीमार पड़ गए। बीमारी के चलते वो कहीं आ-जा नहीं सकते थे, लिहाज़ा खाली बैठने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था। बीमारी के चलते वॉलेस को मौत का डर सताने लगा। इसी दौरान उन्होंने आस-पास के मंज़र को ग़ौर से देखना शुरू किया। उन्होंने देखा कि क़ुदरती चुनौतियों से बचने के लिए पूर्वी एशियाई द्वीपों में पाए जाने वाले जानवरों में कई जेनेटिक बदलाव आए हैं। जैसे यहां उड़ने वाले मेंढक पाए जाते हैं या फिर ओरांगउटान और जानवरों की दूसरी नस्लें भी मिलती हैं।

अपनी रिसर्च के दौरान वॉलेस ने जानवरों की बहुत सी ऐसी प्रजातियां यहां देखी जो सोचने पर मजबूर करती हैं। इन नस्लों को देखने के बाद उनके ज़हन में सवाल उठा कि क्यों कुछ प्रजातियां मर जाती हैं, और कुछ ही ज़िंदा बाक़ी रहती हैं?

जवाब बहुत साफ़ था. जो प्रजातियां बीमार पड़ने पर बदले हुए माहौल के साथ तालमेल बैठा पाती हैं वहीं ज़िंदा रहती हैं, बाक़ी की मौत हो जाती है। इसे आज हम विज्ञान के नेचुरल सेलेक्शन' के सिद्धांत के तौर पर जानते हैं। दरअसल ये अंदाज़ा वॉलेस को ख़ुद बीमार होने पर हुआ था। उन्हें शायद मलेरिया हुआ था। ठंड बहुत तेज़ लग रही थी। वो सोच रहे थे कि घर से इतनी दूर हैं, बेहतर इलाज भी मुमकिन नहीं हैं। वो ठीक कैसे होंगे। अचानक उनके ज़हन में ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस माल्थस की थ्योरी घूमने लगी।

'डार्विन का सिद्धांत' तैयार करने में कौन थे साथ?

माल्थस ने कहा था कि क़ुदरत ज़मीन पर इंसानी की आबादी को ख़ुद ही संतुलित करती रहती है। जब धरती पर जीवों का दबाव बढ़ जाता है, तो क़ुदरत इस पर क़ाबू पाने के लिए बीमारियों, प्राकृतिक आपदाओं जैसे-बाढ़, तूफ़ान या अकाल और लड़ाइयों से बढ़ती आबादी पर क़ाबू पाती है।

वॉलेस को लगा कि ये सिद्धांत तो जानवरों पर भी लागू होता है। जो भी जीव क़ुदरत की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने अंदर ज़रूरी बदलाव करता है, वहीं बचता है, बाक़ी नस्लें नष्ट हो जाती हैं। इसे ही वॉलेस ने नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी बताया।

बीमारी से उठने के बाद वॉलेस ने अपनी थ्योरी का पर्चा लिखकर ब्रिटेन के मशहूर वैज्ञानिक और अपने दोस्त चार्ल्स डार्विन को भेजा। डार्विन को जब वॉलेस कि चिट्ठी मिली तो वो हैरान रह गए। डार्विन धर्मसंकट में पड़ गए। वो ख़ुद इस थ्योरी पर पिछले बीस साल से काम कर रहे थे और अभी उनकी क़िताब पूरी होने में काफ़ी वक़्त था। ऐसे में अगर वॉलेस का पर्चा दुनिया के सामने आता है, तो उनकी अपनी क़िताब का मक़सद ही खत्म हो जाएगा।

लेकिन डार्विन ने एक अच्छे इंसान की तरह वॉलेस की थ्योरी वाले पर्चे को प्रकाशित कराया। बाद में डार्विन ने अपनी क़िताब, 'ऑन द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज़' में इस नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी को विस्तार से समझाया। उन्होंने इस क़िताब में वालेस की सोच को भी पूरी तवज्जो दी। डार्विन की थ्योरी को मज़बूती देने में अल्फ्रेड रसेल वॉलेस का बड़ा योगदान था लेकिन उन्होंने कभी इसका दावा नहीं किया। टर्नेट द्वीप पर अपनी बीमारी से ठीक होने के बाद भी वॉलेस कई साल पूर्वी एशियाई देशों में घूमते रहे।

वहां से वॉलेस साल 1862 में लंदन वापस चले आए। वो अपने साथ करीब सवा लाख से भी ज़्यादा प्रजातियों के नमूने लाए थे। साल 1868 में उन्होंने अपनी यादों का सफ़र भी लिखा। उनका देहांत 90 साल की उम्र में हुआ।

आज दुनिया वॉलेस की शुक्रगुज़ार है कि उन्होंने जानवरों की इतनी नई नस्लों की खोज की। उन्होंने डार्विन की नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी में भी योगदान दिया।


-निखिलेश मिश्रा

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