भाव बिना गती नहीं



 महाराज जी उपदेश दे रहे हैं:

अपना भविष्य अपने हाथ में है, भाव बिना गती नहीं।

मंत्र लेके अभ्यास की जरूरत है।

इन सरल से उपदेशों में महाराज जी हमें एक सफल जीवन जीने का मार्ग दर्शन दे रहे हैं जिसमें अध्यात्म, भक्ति, कम से कम दुःख, सुख -समृद्धि और शांति भी संभव हैं - यदि हम इन पर चलने का चयन और फिर प्रयत्न करते हैं।

यदि हमें महाराज जी से मन्त्र मिला है, प्रत्यक्ष रूप से या अप्रयत्क्ष रूप से किसी के निमित्त (जैसे की वे करते हैं कभी- कभी) तो जैसे बताया गया है वैसे ही उस मन्त्र का अभ्यास करना होगा। वे भक्त भाग्यशाली हैं जिन्हें महाराज जी से मन्त्र प्राप्त हुआ है क्योंकि कही ना कहीं इसमें महाराज जी ने उन्हें, उनका आज और कल दोनों को सार्थक बनाने का अवसर दिया है।

बिना भाव के तो सच्ची भक्ति संभव ही नहीं है -जैसे महाराज जी हमें समय -समय पर याद दिलाते रहते हैं। और यहाँ पर तो वे समझा रहे हैं कि सच्चे भावों के बिना इस संसार रूपी भाव सागर से पार पाना ही नहीं हो सकता। वेश -भूषा बना के, बाहरी या दिखावे वाली भक्ति करके तो हम अपने आप को ही धोखा देते हैं।

इस जीवन में यदि हमें अपने भजन -कीर्तन -सत्संग (भक्ति) की पुकार ईश्वर तक पहुंचाने की, उनकी कृपा का पात्र बनने की लालसा है तो भक्ति में श्रद्धा -विश्वास, अपने भाव को दृढ़ करने का निरंतर प्रयत्न करना होता है। सत्य का साथ देना ही होता है, विशेषकर अपने आप के साथ !! 

और इस सन्दर्भ में दीनता और शांति को तो महाराज जी सबसे ऊपर रखते हैं जैसा की हमने विस्तार से पिछली पोस्ट, यानि की 30 दिसंबर 2020 को की थी (नीचे)। इच्छुक भक्त उसे फिर से पढ़ सकते हैं।

और अब महाराज जी की इस बात का सीधा सम्बन्ध हमारे भविष्य से है , भविष्य में क्या होगा उससे है, संभवतः निकट भविष्य में भी !!

हमने अतीत में जो किया है उसके बारे हम वर्तमान में तो कुछ भी नहीं कर सकते हैं। गलत -सही जो भी था, वो तो बीत गया। वर्तमान को भी बदल नहीं सकते क्योंकि उस सर्व शक्तिशाली परम आत्मा ने हमारे पूर्व कर्मों के आधार पर ही वर्तमान में हमारे सामने परिस्थितियां प्रस्तुत की हैं।

हाँ इन परिस्थितियों का सामना हम कैसे करते हैं या ये कहें इनमें हम कैसे कर्म करते हैं -ये हमारे भविष्य को भी तय करेंगे। और यहाँ पर सब केवल हमारे ऊपर ही निर्भर करता है - अर्थात यदि हम अपने विवेक की आवाज़, उसके संकेत को सुनने/ मानने का चयन करते हैं तो जीवन सुखद होगा। ये निश्चित है।

यदि वर्तमान में अपने स्वार्थ के लिए, हम अपने शरीर के किसी भी अंग से अपने -परायों को दुःख दे रहे हैं (विशेषकर वाणी से), तो भविष्य में किसी ना किसी स्वरुप में हमें दुःख मिलना ही मिलना है, कभी -कभी उससे भी अधिक जितना हम दूसरों को दे रहे हैं। 

यदि हम छल कपट करके पैसे कमा रहे हैं, संपत्ति संचित कर रहे हैं तो महाराज जी ने हमें चेताया है की आगे हमारे साथ तो बुरा होगा ही, हमारे अपनों के साथ भी बुरा होगा। क्योंकि बेईमानी की रोटी उन्होंने ने भी खाई है। 

ये दुखद है क्योंकि कुछ लोग इस भ्रम में छल -कपट करते हैं की इससे आगे चलके उनके अपनों का कल्याण होगा और वास्तव में छल -कपट के कर्म करके वे अपनों का ही बुरा भी करते हैं। वो सर्वज्ञ परमात्मा सब जानता है। वो अपनी सैकड़ो आँखों से सब देखता है, सबको देखता है।

वो ये भी देखता है -यदि हमने जात -पात से ऊपर उठकर, बिना किसी अपने फायदे के ज़रूरतमंदों की मदद की है, जितना भी हम से बन पड़े। फिर वैसा ही अच्छा हमारा भविष्य होगा।

तो अपने भविष्य को अच्छा बनाने लिए, सुखद बनाने के लिए हमें अभी, वर्तमान में अपने चाल -चलन, अपने व्यव्हार पर जागरूक रहकर कर्म करना होगा। ये चिंतन करके की जो कर्म हम कर रहे हैं, वो क्यों कर रहे हैं ?? महाराज जी के उपदेश के अनुसार उसका फल क्या हो सकता है ?? यदि हम इस बात का अभ्यास करना आरम्भ कर दें तो ये तय है की हम बुरे कर्म, कम ही करेंगे।

और यदि हमने बिना सोचे -समझे बुरा कर्म कर ही दिया है (जैसे कि हममें से अधिकतर लोग करते भी हैं) तो ऐसी परिस्थिति में भी चिंतन किया जा सकता है जिससे की भविष्य में हम ऐसे बुरे कर्म ना करें। हाँ जो कर दिया उसका फल तो मिलेगा। इसीलिए महाराज जी ने संभवतः कहा है की हमारा भविष्य काफी हद तक हमारे ही हाथ में है।

महाराज जी के इन उपदेशों पर चलना बहुत सरल नहीं हैं परन्तु संभव है -ये निश्चित है, यदि हममें इच्छा शक्ति है। यदि हम धैर्य रखकर कोशिश करेंगे तो हमें महाराजजी का प्रोत्साहन भी मिलेगा।

महाराज जी सबका भला करें।

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