राष्ट्रीय ई-संगोष्ठीः ‘‘भारतीय भाषाओं में राम‘‘ का किया आयोजन

लखनऊ। राष्ट्रीय ई-संगोष्ठीः ‘‘भारतीय भाषाओं में राम‘‘ का आयोजन उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान एपलीकेशन के माध्यम से आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन भोजपुरी अध्ययन केन्द्र, बीएचयू, वाराणसी की शोध छात्रा सविता पाण्डेय के द्वारा सरस्वती वंदना एवं रामचरित मानस की चैपाईयों के गायन के साथ किया गया।  कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए संचालन कर रही डाॅ0 पूनम सिंह ने आगंतुक सभी विद्वानों का परिचय कराया और ‘‘कार्यक्रम की रूपरेखा के अनुरूप ‘‘भारतीयों भाषाओं में राम‘‘ विषय पर राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी का विधिवत शुभारम्भ किया गया। संगोष्ठी में अधोलिखित विद्वानों ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। 

प्रो0 रजनीश मिश्र (मुख्य अतिथि/बीज वक्तव्य): रामाय राम भद्राय राम चंद्राय वेधसे, रधुनाथाय नाथाय सीताया पतयेः नमः। रामायण आदिकालीन है। आदिकावि बाल्मीकि द्वारा प्रथम रूप से राम के चरित का विस्तृत वर्णन किया गया है। रामचरितमानस एवं महाभारत भारतीय संस्कृति के सूत्र हैं। कालजयी रचना अपने समय को व्याख्यायित करके होती है। कालजयी रचना अपने समय की सर्वोत्तम व्याख्या होती है। भारतीय संस्कृति के दो मुख्य केन्द्र राजा राम एवं कृष्ण जी दोनों उत्तर प्रदेश से ही आते हैं। इसी से प्रदेश की सांस्कृति विरासत का अनुमान लगाया जा सकता है। इससे तय होता है कि प्रदेश की संस्कृति कितनी व्यापक है। जब तक नदियाॅ प्रवाहित हो रही हैं, राम के व्यक्तित्व की व्याख्या होती रहेगी। रामकथा एक सभ्यता मूलक आख्यान है। धर्म वही है, जो सनातन है, और राम का व्यक्तित्व वही सनातन धर्म है। 

डाॅ0 सर्वेश कुमार सिंह (मुख्य अतिथि)  तुलसी के राम सबके राम हैं। किंतु वामपंथी विचार ने उन्हे प्रश्नांकित किया है। झूठे आरोप लगाए जबकि तुलसी कृत मानस एक लोकतांत्रिक कविता है। विशुद्ध साहित्यिक पद्य है। मानस के मुख्य प्रवक्ता शुद्र ऋषि काक भुशुण्डि हैं। मानस स्त्री सीता को समर्पित ग्रन्थ है। उसे हमें पुनः मुख्यधारा में लाना होगा। वामपंथियों के दुष्प्रचार को खत्म करना पडे़गा। 

अध्यक्षीय वक्तव्यः डाॅ0 राजनारायण शुक्ल, कार्यकारी अध्यक्ष, उ0प्र0 भाषा संस्थानः विभिन्न भारतीयों भाषाओं में राम के चरित को वहाॅ के युगीन परिस्थितियों के माध्यम से वहाॅ के आम जनमानस में प्रस्तुत किया गया है। घटित राजा राम के चरित्र को उद्घाटित करने का कार्य किया है नारद मुनि ने और युगीन रचनाकारों ने। राम जननायक राम हैं। शबरी, अहिल्या, केवट सबके साथ खड़े रहने वाले राम हैं और ऐसे जननायक राम को यदि कुछ लोग कुत्सित विचारों से तोड़ने का प्रयास करते हैं, तो ये बहुत हास्यास्पद है, ये भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है। लोग तो यहाॅ तक कहते हैं कि जो कबीर के राम हैं, वो तुलसी के राम नहीं हैं, तुलसी के राम तो दशरथ पुत्र हैं। मेरा ये मानना है कि राम के स्वरूप के विषय में भेद करने की क्या आवश्यकता क्या है ? बस कबीर के राम निराकार रूप में हैं और तुलसी के राम साकार रूप में है। 

प्रो0 प्रदीप के शर्माः (विशिष्ट अतिथि)ः बाल्मीकि रामायण देशकाल अनुसारी स्वतंत्र रूपांतर है। 14 वीं सदी में माधव कंदली ने बरहा राजा महामाणिक्य के आग्रह से इस काव्य की रचना की। बाल्मीकि के राम महामानव हैं। तुलसी के राम परम ब्रहम हैं और कंदली के राम दोनों ही हैं। राम के वन गमन का समाचार सुनकर सीता ‘‘ हाॅ प्रभु‘‘ कहकर पृथ्वी पर गिर पडती हैं और छाती पर प्रहार करने लगती हैं। राम का वस्त्र पकडकर गिडगिडाती हैं, प्रभु मत जाऔ। राम भी विलाप करते हैं कि सीता के बिना मुझे सारा संसार विष तुल्य लगता है। मैं प्राणेश्वरी के बिना वन में मर जाउंगां। असमिया लोकगीतों में रामकथा की तलाश करें तो हम देखते हैं कि व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार में राम उनके जीवन से जुडी घटना प्रसंगों का बहुत ही सजीव वर्णन है।

प्रो0 योगेन्द्र प्रताप सिंह, एसो0 प्रो0 हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विवि, प्रयागराज (मुख्य वक्ता)ः भारत का सांस्कृतिक भूगोल सर्वाधिक व्यापक है, भारत की लोक चेतना में रामकथा सर्वत्र व्याप्त है। भारत की सांस्कृतिक तस्वीर नेपाल से लेकर दक्षिण के श्री लंका तक जाती है और पूर्व के अरूणांचल से लेकर पश्चिम के अफगानिस्तान सीमा तक सभी भाषाओं में राम की व्याप्ति है। नेपाली रामायण के विषय में बताते हुए कहा कि, नेपाल में भानु भक्त विरचित रामायण के साथ-साथ अध्यात्म रामायण, बाल्मीकि रामायण और तुलसी का रामचरित मानस जन-जन का कंठाहार है।

प्रो0 अमर ज्योति, उच्च शिक्षा शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, धारवाड़, कर्नाटक (विशिष्ट वक्ता): द्रविड भाषाओं में मुख्यतः तमिल, तेलुगू और कन्नड में राम का चित्रण देवता के रूप में और मनुष्य के रूप में हुआ है। जहाॅ बाल्मीकि रामायण का अनुसरण किया गया है वहाॅ उनका देवत्व अभिव्यक्त हुआ है और लोककथाओं में लोक गीतों में लोक नाट्यों में उनका मनुष्य रूप ही उभर कर आया है।

सत्र अध्यक्षः प्रो0 शंकर लाल पुरोहित: भारत की सारी समस्याओं का समाधान रामकथा में है क्योंकि राम सेकुलरता के प्रतीक हैं किसी धर्म विशेष के नहीं। 

(संगोष्ठी समाहार वक्तव्य): डाॅ0 श्रीनिवास त्यागी, गार्गी काॅलेज, दिल्ली विविः राम का व्यक्तित्व और राम का चरित्र इतना विराट और इतना विशद है कि उसका गायन सदियों से निरंतर हो ता आ रहा है और आगे भी होता रहेगा।उनका चरित्र,उनका जीवन इतना उद्दात और मानवीय है कि आज राम जन-जन में जन जन के मन में रमे हुए हैं।राम कथा के माध्यम से बाल्मीकि ने श्रीराम के जिस चरित्र का आख्यान हमारे सामने किया,आगे हर कथा का मूल प्रस्थान बिंदु भले ही नहीं बदला हो।लेकिन भारतीय भाषाओं में अपने समय,समाज और संस्कृति के अनुकूल उनमें बहुत कुछ नया जोड़ा और घटाया गया है।अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय भाषाओं में राम की व्याप्ति अनंत है।वह उसी प्रकार से अनंत है जिस प्रकार से ‘हरि व्यापक सर्वत्र समाना’ और ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’। 

इस विमर्श के माध्यम से राम के चरित्र के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें प्रोफेसर रजनीश कुमार मिश्र जी ने कहीं जिनको डॉक्टर सर्वेश सिंह ने भी अपने वक्तव्य में उद्धत किया वह है राम का एक ऐसा चरित्र जो कभी न विचलित होने वाले नायक का चरित्र है।उनके चरित्र और व्यक्तित्व की दूसरी विशेषता है कि सत्य में सत्य के साथ प्रतिष्ठित नायक राम का पूरा जीवन सत्य का जीवंत उदाहरण है।इस संगोष्ठी की बड़ी बात यह रही कि इसके माध्यम से तमाम उन आरोपों और विचारों का खंडन किया गया जो अमूमन श्रीराम के ऊपर लगाए जाते हैं।इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि रामायण,महाभारत और गीता तीनों मानव सभ्यता के त्रिभुज की तीन भुजाएं हैं इनके बिना मानव सभ्यता का मानवीय रूप संभव नहीं है।

कार्यक्रम का सफल संचालन डाॅ0 पूनम सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, एस डी पी जी काॅलेज, गाजियाबाद के द्वारा किया गया। 


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