भगवान केवल प्रेम के भूखे हैं

भगवान प्रेम के भूखे हैं। भक्त के द्वारा प्रेमपूर्वक दिए गए उपहार को भगवान स्वीकार ही नहीं कर लेते, प्रत्युत उसको खा लेते हैं। भक्त का देने का भाव रहता है तो भगवान का भी लेने का भाव हो जाता है।

जब भक्त का भगवान को देने का भाव बहुत अधिक बढ़ जाता है तब वह अपने आप को भूल जाता है। भगवान भी भक्त के प्रेम में इतने मस्त हो जाते हैं कि अपने आप को भूल जाते हैं। प्रेम की अधिकता में भक्त को इसका ख्याल नहीं रहता कि मैं क्या दे रहा हूं तो भगवान को भी यह ख्याल नहीं रहता कि मैं क्या खा रहा हूँ।

 

जिस प्रकार विदुरानी के प्रेम के आवेश में भगवान को केलों की गिरी ना देकर छिलके देती है, तो भगवान उन छिलकों को भी गिरी की तरह खा जाते हैं। शबरी के दिए हुए फल खाकर भगवान इतने प्रसन्न हुए कि जहां कहीं भोजन करने का अवसर आया वहां शबरी के फलों की प्रशंसा करते हैं।

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