शास्त्रों का जानकार होकर भी करुणा की भावना का अभाव हमे व्यर्थ बनाता है


प्रेम की जरूरत है, पढ़ने की जरूरत नहीं

हमारे आस- पास शास्त्रों और दिव्य- ग्रंथों के जानने वाले अनेक हैं। इनमें कुछ इस जानकारी से अपनी जीविका चलाते हैं, फेसबुक इत्यादि पर अपनी मार्केटिंग भी करते हैं। इसमें कुछ बुरा नहीं है, यदि ये सब मर्यादा में रहे। बिना छल-कपट के और सद्भावना-प्रेम वाले वातावरण में रहे। दुर्भाग्यवश बहुत से किताबी ज्ञानियों को अपनी जानकारी का अहंकार भी हो जाता है। ईश्वर जब कुछ-कुछ लीला करके ऐसे अहंकार का नाश करते है तो ऐसे लोगों को दुःख उठाना पड़ सकता है। महाराज जी ने भी हमें ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिए कहा है कई बार।

वैसे कुछ एक दिव्य ग्रंथों के जानकार विनम्र भी मिल जाते हैं। यहाँ पर संभवतः महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं कि भले ही हम शास्त्रों और दिव्य ग्रंथों के जानकार हों परन्तु यदि हममें दया और करुणा की भावना नहीं है, विशेषकर परायों के लिए तो ये हमारी जानकारी व्यर्थ है। संभवतः महाराज जी यहाँ पर हमें ये भी समझा रहे हैं कि यदि किसी ने दिव्य ग्रन्थ ना भी पढ़े हों परन्तु निस्वार्थ भाव से जीव-जंतुओं की, ज़रूरतमंद लोगों की मदद, यथासंभव और प्रेम के साथ करता है, करुणामयी है तो वो दिव्य ग्रंथों के जानकार समान पूज्य होता है, कभी-कभी उनसे भी अधिक।

जैसा की हमें ज्ञात है, महाराज जी ने उन लोगों को बहुत ऊँचा स्थान दिया है जो वास्तविकता में विनम्रता -पूर्वक, प्रेम से बात करते हैं, संवाद करते हैं- सबके साथ। इस सन्दर्भ में कबीरदास जी ने बहुत अच्छा कहा है- पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

महाराज जी सबका भला करें।

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