हमारे दिव्यग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन में इन चार पदार्थों की प्राप्ति को आदर्श कहा गया है

 


तुम लिखते ऐसा हो - मालूम होता है ब्रह्मज्ञान का सब संगोपांग तुम्हारे पासै है। संसार में जिसको जरूरत होती है (हमसे) मिलता है और करते कुछ नहीं। मन में अटल विश्वास नहीं है। अगर विश्वास होता तो चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मिल गये होते। तुम्हारे ग्रह भी बाधक हैं। वे करने नहीं देते। अगर उनका यथा शक्ति हक मिल गया होता, तो जल्द काम हो जाता।

हमें भगवती जी ने हुकुम दिया है - जप, पाठ, पूजन, कीर्तन, दान, सेवा धर्म बता दिया करो। जो मन लगाकर करेगा, उसका काम हो जावेगा। बिना मन लगे कोई काम नहीं होता। चाहे अच्छा हो या खराब हो - उसका फल जीव को मिलता है।

महाराज जी अपने भक्तों का मार्गदर्शन करते रहते हैं (आज भी) - फिर चाहे वो गुरुमंत्र के माध्यम से हो, उपदेशों के माध्यम से हो या कुछ और ….. अब उन पर चलना या ना चलना, ये भक्त के ऊपर है। जो चल पाते हैं या चलने का धैर्यपूर्वक और निरंतर प्रयास करते हैं उनका कल्याण हो जाता है या होने लगता है। ये निश्चित है। 

हमारे दिव्यग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन में इन चार पदार्थों की प्राप्ति को आदर्श कहा गया है। अब इस बात को जानने वाले तो बहुत हैं (जैसे ये भक्त जिसको महाराज उपदेश दे रहे हैं) परन्तु इनकी प्राप्ति के लिए कर्म करने की इच्छाशक्ति कम ही लोगों में होती है।  

ऐसे बहुत से लोग भगवान और उनकी लीला को लोगों को तो सुनाते हैं परन्तु स्वयं भगवान के ऊपर अटल विश्वास नहीं रखते। महाराज जी कहते हैं की यदि विश्वास होता तो चारों पदार्थ उन्हें मिल गए होते। कुछ दिव्य ग्रंथों की जानकारी वाले ऐसे लोगों पर जब जीवन में कठिन समय आता है तो वे जल्दी विचलित हो जाते हैं । संभवतः इसलिए क्योंकि उनके कथनी और करनी में अंतर होता है। ऐसे कुछ किताबी ज्ञानी आज भी हमारे आसपास अनेकों मिल जाते हैं।

आगे महाराज जी कहते हैं कि जो भी:

सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करेगा (जप, पाठ, पूजन, कीर्तन इत्यादि) और,

साथ ही साथ,

निस्वार्थ भाव से पर सामर्थ अनुसार वंचितों की मदद करेगा (दान, सेवा-धर्म),

- उसके कल्याण का कोई काम रुक नहीं सकता है !!

ऐसे परमार्थ और परस्वार्थ के मार्ग पर बेमन से किये गए प्रयासों से हमारा कल्याण संभव नहीं है। मन के सन्दर्भ में भी जैसा की आप सब को ज्ञात है महाराज जी का कहना कि मन से कभी -कभी जबरदस्ती करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि वो चंचल है।

और हाँ, महाराज जी हमें एक बार फिर से याद दिला रहे हैं की हमारे छोटे से छोटे और बड़े अर्थात प्रत्येक कर्म का फल हमें भगवान देता ही देता है !! 

कुछ बच के नहीं रह सकता, कोई बच के जा नहीं सकता और इस प्रक्रिया से कोई हमें बचा भी नहीं सकता है - इस अटल सत्य को जितना अधिक हम अपने आप को याद दिलाते रहेंगे, तदनुसार वैसे ही कर्म करेंगे उतना ही हमारे जीवन में सुख और दुःख का अनुपात होगा। निर्णय हमें ही लेना है और जितनी अधिक बार इस सन्दर्भ में हम अपने  विवेक का उपयोग करने में सफल रहेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा।  

महाराज जी की कृपा सब भक्तों पर बनी रहे।

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