भारत का लोकतंत्र पूंजीवाद का पाखण्ड बनकर रह गया है

 
हर्षद मेहता का घोटाला 1991-92 करीब 700 करोड़ रुपये का था। यह वह हानि थी जिसमे उसने दो छोटे बैंकों- बैंक ऑफ कराड (बीओके) और मेट्रोपॉलिटन को-ऑपरेटिव बैंक (एमसीबी) से फर्जी बीआर (बैंक रिसिप्ट) जारी करवाईं। इनके बदले मेहता ने कई बैंकों से नकद पैसा लिया और उसे शेयर बाजार में लगाया। इससे वह फौरन मुनाफा कमाता और बैंकों का पैसा उन्हें लौटा देता।
 
जब तक शेयर बाजार ऊपर चढ़ता रहा तब तक तो इसकी भनक किसी को नहीं लगी, मगर जब शेयर बाजार डूबा तो आम मध्यम वर्गीय लाखों निवेशकों के कई हजार करोड़ डूब गए जिसकी कोई भर पाई नहीं हुई। सैकड़ों लोगों ने आत्महत्या कर ली। हज़ारों लोग बर्बाद हो गए और लाखों लोग अपनी जिंदगी भर की कमाई और बचत को हमेशा के लिए गंवा बैठे। फिर 2001 में केतन पारेख शेयर घोटाला करते है।करीब चार हजार करोड़ का। प्रत्यक्ष रूप से माधव मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक दिवालिया हो गया। हजारों करोड़ की बचत डूब गई और अप्रत्यक्ष परिणाम वही हुए जो हर्षद मेहता के घोटाले के हुए और केतन पारेख हर्षद मेहता का शिष्य था।
 
  
माल्या 9000 करोड़ लेकर यू0के0 में ऐशो आराम से जिंदगी बिता रहा है। पैसा बैंको ने दिया बर्बाद आम आदमी हुआ। ललित मोदी पनामा और कैरेबियन द्वीपों में मजे कर रहा है। हजारों करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग का दोषी है वह! अब नीरव मोदी 12000 करोड़ बैंको से लूटकर बड़े आराम से सपरिवार स्विजरलैंड में आराम फरमा रहा है जहां के एक वीकेंड बिताने के सपने देखने वाला भारत का मध्यम वर्गीय टैक्स पेयर जिंदगी भर अपनी बचत इकट्ठा करने के बाद भी इस सपने को पूरा नहीं कर पाता है। गरीब आम भारतीय की बात तो आप छोड़ दीजिए। क्या आप जानते हैं भारत मे धनवान वे ही लोग हैं जिनके पैसे इन घोटालों में डूबते रहते हैं। क्या कभी अम्बानी, अडानी, टाटा, माल्या, नीरव, लिंगराजु के पैसे डूबते सुना है आपने? नहीं न।

यही हमारे लोकतंत्र का पूंजीवादी पाखंडी स्वरूप है। लोकतंत्र बेशक हमारा है परंतु इसका कब्जा पूंजीवादी कॉरपोरेट के पास है। यह लोकतंत्र हमारा मालिक और भाग्य विधाता अवश्य है परंतु यह पूंजीवाद का बंधक बन चुका है। एक सत्य जो सबसे छुपाया जाता है वह यह कि आपका पैसा बैंको में सुरक्षित न कभी था, न कभी है और न कभी रहेगा। जरा सोचिये नीरव मोदी 12000 करोड़ लेकर चंपत हो गया है वो किसके थे। ये वो पैसे थे जो आपने मैंने और देश के करोड़ों लोगों ने बैंक में मजबूरी वश रखे हैं। आम आदमी कैश घर मे रख नहीं सकता। यह गैर कानूनी होने के साथ असुरक्षित भी है। विभिन्न प्रकार के निवेश है जिसमे शेयर मार्केट तो सैकड़ों बार आम जनता को बर्बाद कर चुका है, के अलावा म्यूचल फंड आदि भी शेयर की राह पर चलते हैं।
 
सोना चोरों से सुरक्षित नहीं है तो प्रोपर्टी माफिया के चुंगल में है। फिर आम आदमी अपना पैसा बैंक में रखता है। नोट बन्दी के बाद तो सब पैसा बैंकों में ही है। अब 15 लाख करोड़ बैंको ने एनपीए के रूप में कॉर्पोरेट में डूबते खाते में डाल रखे हैं। विभिन्न घोटालों ,चिटफंड,पोंजी स्कीमों,में सीधे डूबने वाले भी लाख करोड़ तो होंगे ही। जब इन घोटालों के दोषी करोड़ों की गाड़ियों और अरबों के बंगलो में सात पुश्तों का इंतजाम कर विदेशों में मौज कर रहे होते हैं तो यही बैंक हमारी सेविंग्स पर ब्याज कम कर रहे होते हैं। जब कॉरपोरेट मुफ्त में बिलानाम और किसानों की जमीन लेकर अपनी पीढ़ियों के बंदोबस्त कर रहे होते हैं तो बैंक हमसे ट्रांजेक्शन चार्ज वसूल कर घाटा कम कर रहे होते हैं।
 

जब ललित मोदी हजारों करोड़ के हवाला करके देश को गरीब करके कैरेबियन में द्वीप खरीदता है तो हम अपने डिएक्टिवेट एकाउंट को एक्टिव करने के चार्ज बैंक को देकर धन्ना सेठों के आसान कर्ज की व्यवस्था करते हैं। जब किसान इंश्योरेंस के पैसे कटवाता है और नौकरी पेशा अपनी तनख्वाह से इनकम टैक्स कटवाता है तो बैंक उन इंश्योरेंस कम्पनियों को उन्ही किसानों और नौकरी पेशा लोगों की बचत लोन के रूप में दे रहा होता है। 1975 से1995 तक लाखों किसानों ने अपनी इनकम टैक्स मुक्त आय एफ ड़ी के रूप में बैंकों में जमा करवाई।जानते हैं उसका क्या हुआ? उसका ब्याज घटता गया, ब्याज पर टैक्स बढ़ता गया और अनगिनत घोटालों में बैंक की हानि की भरपाई के शुल्कों का शिकार होकर वह बचत शून्य हो गयी।

इन घोटालों से न तो बैंको का कुछ बिगड़ता है और न सरकार का। बिगड़ता है तो सिर्फ आम आदमी का जिस पर सरकार और टैक्स लगा लेगी। सिर्फ किसान का बुरा होगा जिसकी फसल का समर्थन मूल्य इस घाटे के कारण अब बढ़ाया नहीं जा सकेगा। बिगड़ेगा तो नौकरीपेशा वर्ग का जिसके लिए महंगाई तो बढ़ेगी परन्तु उनकी तनख्वाह नहीं बढ़ेगी। बिगड़ेगा तो सिर्फ गरीब का जिसके बच्चों के लिए न शिक्षा होगी न परिवार के लिए चिकित्सा होगी। उसको अब और गरीब होने के लिए विवश होना पड़ेगा। हां, माल्या, नीरव, ललित तो स्विजरलैंड और कैरेबियन द्वीपों में मौज करने के लिए ही पैदा हुए है और लोकतंत्र? पूंजीवाद का पाखण्ड बनकर रह गया है और सरकार?

ओह!! उसके बारे में तो हम भूल ही गए थे। चलो अगली बार उस पर भी चर्चा करेंगे। कभी,अगर सम्भव हुआ तो।

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