गुरूद्वारा नाका हिण्डोला में श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया साहिबजादा अजीत सिंह का जन्मोत्सव

लखनऊ। श्री गुरू गोबिंद सिंह जी के बड़े पुत्र साहिबजादा अजीत सिंह का जन्मोत्सव श्री गुरु सिंह सभा, ऐतिहासिक गुरूद्वारा नाका हिण्डोला, लखनऊ में बड़ी श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। प्रातः के दीवान में सुखमनी साहिब के पाठ साहिब के पाठ के उपरान्त रागी जत्था भाई राजिन्दर सिंह ने अपनी मधुरवाणी में शबद कीर्तन गायन कर संगत को निहाल किया।

उसके उपरान्त ज्ञानी सुखदेव सिंह ने साहिबजादा अजीत सिंह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि श्री गुरू गोबिंद सिंह जी के बड़े पुत्र साहिबजादा अजीत सिंह का जन्म संवत् 1743 को हिमाचल प्रदेश के पाऊंटा साहिब में हुआ। छोटी उम्र में बड़ी कुर्बानी के कारण सिख इतिहास उनका सम्मान बाबा अजीत सिंह के नाम से भी करता है। जब बाबा अजीत सिंह 5 महीनों के हुए तो उस समय दसवें पातशाह श्री गुरू गोबिंद सिंह की पहाड़ी राजाओं से भंगानी के मैदान में घमासान की लड़ाई हुई थी। इस लड़ाई में गुरू के साथीयों ने महान जीत हासिल की थी जिस की खुशी के कारण साहिबजादे का नाम अजीत सिंह रखा गया। छोटी आयु में ही अजीत सिंह काफी बुद्धिमान थे। जहां उन्होने गुरबाणी का गहन ज्ञान हासिल किया, वही सिख योद्धायों व गुरू पिता से युद्ध कलाओं में भी मुहारत हासिल की।


साहिबजादा अजीत सिंह ने अपनी आयु का अधिक समय गुरू गोबिंद सिंह जी की छत्र छाया तले श्री आनंदपुर साहिब में ही व्यतीत किया। एक दिन कलगीधर पातशाह का दरबार सजा हुआ था। एक गरीब देवी दास ब्राह्मण रोता हुआ आकर कहने लगा मैं जिला होशियारपुर के गांव बस्सी का रहने वाला हूं। गांव के पठानों ने मेरी पिटाई करके मेरी धर्म-पत्नी भी मेरे से छीन ली है। कृपा मेरी इज्जत मुझे वापिस दिला दो। गुरू गोबिंद सिंह जी ने साहिबजादा अजीत सिंह को कहा कि “बेटा! जी कुछ सिखों को साथ लेकर जाओ तथा जाबर खां से इस मजलूम की पत्नी छुडवा कर ले आओ। साहिबजादा अजीत सिंह ने 100 घुडसवार सिक्खें का जत्था साथ लेकर बस्सी गांव पर धावा बोल दिया।

जाबर खां की हवेली को घेर लिया तथा ब्राह्मण की पहचान पर उसकी अबला पत्नी को जालिम के कब्जे से छुड़ा लिया। अपने लक्ष्य को हासिल कर जब वह श्री आनंदपुर साहिब आए तो गुरू पिता ने उनका बहुत सम्मान किया। ब्राह्मण की पत्नी उसको सौंप दी गई तथा कुकर्मी जाबर खां को सजा दी गई। जब लड़ाई के मैदान में सिक्खों को युद्ध करते देख कर साहिबजादे का खून भी उबलने लगा। तब उन्होनें गुरू साहिब से मैदान-ए-जंग में जाने की आज्ञा मांगी तो गुरु जी ने पुत्र को सीने से लगा लिया तथा कहा, जब मैने अपने पिता (गुरू तेग बहादुर जी) को शहीद होने के लिए भेजा था तो उस समय मैने धर्मी पुत्र होने का फर्ज अदा किया था। उसी तर्ज पर आज मैं तुम्हें रणभूमि में भेज कर धर्मी पिता का फर्ज निभाना चाहता हूँ।

गुरू जी ने खुशी व उत्साह से साहिबजादा अजीत सिंह के शीश पर हीरों से जड़ी सुंदर कलगी को सजा कर जंग में भेजा जैसे बारात में भेजा जाता है। जब वह बाहर निकले तो मुगलों की फौज को प्रतीत हुआ कि हजूर स्वंय गढ़ी से बाहर आ गए है। भारी संख्या में विरोद्धियों को सदा की नींद सुला के बाबा अजीत सिंह आप भी शहादत प्राप्त कर गए। सारा जिस्म तीरों व तलवारों से छलनी हुआ पड़ा था परन्तु आत्मा परमात्मा में लीन हो चुकी थी। अपने फर्जन्द की बहादुरी को देख कर दशमेश पिता कह रहे थे, ”बेटा अजीत! तेरी शहादत ने सही अर्थ में मुझे अकाल पुरख की ओर से सुरखरू कर दिया है। 

दीवान की समाप्ति के उपरान्त लखनऊ गुरूद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अध्यक्ष स0 राजेन्द्र सिंह बग्गा ने आई साध संगतों को साहिबजादा अजीत सिंह के जन्मोत्सव की बधाई दी। उसके उपरान्त चाय का लंगर श्रद्धालुओं में वितरित किया गया।

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