निर्लजता है एक बाक़ी और बस अभिमान है


सदगुरु भगवान जी की जय हो, आप भी यदि छोड़ देंगे फिर कहां जाऊंगा मैं। जन्म दुख से नाव कैसे पार कर पाऊंगा मै।। मुझमें है जप तप न कुछ साधन नहीं कुछ ज्ञान है। निर्लजता है एक बाक़ी और बस अभिमान है।।

हे मेरे गुरुदेव करुणा सिंधु करुणा कीजिए। हूं अधम आधीन अशरण अब शरण में लीजिए।।बैकुंठ धाम के अमृत फल भजनानंदी बने भोजनानंदी नहीं बेवजह बेकुसूर कोई कोई गाली दे तुम्हे रंज न हो,उसके हांथ जोड़ दो। यह भजन खुलने की कुंजी है। किसी की जीविका जाती होझूठ कह दो, वैसे झूठ न बोलो। भजन में दीनता,शांति की बड़ी जरूरत है। सदगुरु मिला दो कृपा निधि यह वचन मन भाया करो सीता रमण राधे रमण लक्ष्मी रमण दाया करो।। जय सदगुरुदेव भगवान जी की

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