महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर "शिव-पार्वती विवाह" प्रसंग का कीजिए रसास्वादन


शिवहिं शंभु गन करहिं सिंगारा।  जटा मुकुट अहि मौर सँवारा।।  कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।

तन बिभूति पट केहरि छाला।।  शशि ललाट सुंदर सिर गंगा।  नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।

गरल कंठ उर नर सिर माला।  अशिव बेष शिव धाम कृपाला।।

शङ्कर जी के गण, शिव जी का श्रृंगार कर रहे हैं। उन्होंने उनकी जटा का मुकुट बनाया और सर्प से मौर को सँवारा, कुंडल, कंकण और किंकिनी के रूप में भी शिव जी ने सर्प को ही धारण किया। शरीर में विभूति और मृगचर्म को ही धोती के रूप धारण किया। मस्तक पर चन्द्रमा और सिर पर सुन्दर गंगा जी विराजे, तीन नेत्र और सर्प ही यज्ञोपवीत बने। कंठ में विष और हृदय पर मनुष्यों के सिर की माला धारण किया। उनका वेश तो अकल्याणमय अर्थात् भयंकर हैं, पर स्वयं शङ्कर जी सभी कल्याणों के भवन और कृपालु हैं।


महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर "शिव - पार्वती विवाह" प्रसंग का रसास्वादन कीजिए।

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