सच्ची भक्ति किसी भी तरह की बाहरी दिखावटी भक्ति से परे होती हैं


महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं:

भगवान इतने सस्ते नहीं हैं। भक्त होना बड़ा कठिन है। जियते मर जाना-तब जियतै मुक्ति, भक्ति, देवता संग खेलना, सब कुछ जीते जी हो जाता है। इसमें शान्ति, दीनता की बड़ी जरूरत है। प्रेम की जरूरत है।
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हममें से कुछ लोग भगवान को प्रसाद- चढ़ावा चढ़ाते हैं, कुछ उन्हें धन अर्पित करते हैं, कुछ सोना -चांदी चढ़ाते हैं इत्यादि - ये सब करना उन्हें अच्छा लगता है तो करना चाहिए। यदि हमारी इच्छा इस ब्रम्हांड के संचालक उस सर्वशक्तिशाली परम आत्मा को प्रसन्न करने की है, तो केवल ये सब करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है। जो उसने हमें दिया है, उसको हम, उसी का ही दिया हुआ अर्पण करके ये कैसे अपेक्षा कर सकते हैं की वो प्रसन्न हो जाएगा…… 

ईश्वर अपनी असंख्य आँखों से हमारी सब गतिविधियां देखता है, हमारे सब कर्मों पर उसकी नज़र होती है। सच्ची भक्ति किसी भी तरह की बाहरी दिखावटी भक्ति से परे होती हैं। तभी महाराज जी कहते हैं की भगवान इतने सस्ते नहीं है की इस तरह की हमारी गतिविधियों से प्रसन्न हो जाएं।

जैसा हमारे महाराज जी ने भगवान की सच्ची भक्ति करने के लिए समय -समय पर हमारा मार्गदर्शन किया है -इसके लिए सर्वप्रथम हमें उस परम आत्मा की बनाई हुई हमारे जैसी ही अन्य आत्माओं (पशु- पक्षी अन्य जीव) के लिए प्रेम भाव होना आवश्यक है। जैसे हम कुछ दिन पहले चर्चा कर रहे थे कि अपनों के लिए बहुत से लोग करते हैं परन्तु भगवान को प्रसन्न करने के लिए हमें परायों की, अपने सामर्थ अनुसार, सेवा करनी होगी, मदद करनी होगी -ऐसे वंचितों की जो हमारे मदद के कर्म को हमें वापस करने में असमर्थ हों, वास्तव में हमें उनसे ऐसी अपेक्षा भी नहीं रखनी होगी। 

महाराज जी आगे कहते हैं की जब हमें दीनता होती है, जब हम ये मान के चलते है की जो भी हमारा है वो सब वो सब भगवान की ही दिया हुआ है, तब हम औरों के साथ विनम्रता से व्यवहार करने में समर्थ होते हैं और सबसे महत्वपूर्ण -ऐसे लोगों ने अहंकार का दमन कर लिया होता है- उनके ऊपर अपने- परायों के अपमान-तिरस्कार का असर नहीं होता है। उनका अपनी हस्ती मिटाकर ईश्वर में पूर्ण समर्पण होता है और शांति -दीनता के बिना तो ये सब संभव ही नहीं है। 

वाकई में ईश्वर की सच्ची भक्ति आज के ज़माने में बहुत कम ही लोग कर पाते हैं और जो कर लेते हैं उन्हें वर्तमान जीवन में ही अपने इष्ट के दर्शन हो जाते हैं और साथ ही साथ उनके लिए मुक्ति- मोक्ष भी संभव हो जाता है। ये बार बार संसार में माँ की कोख से आना और फिर अर्थी पर चढ़ कर चले जाने की प्रक्रिया, जिसमें प्रायः सुख का तो एक ही भाग होता है और दुःख के तीन - इससे मुक्ति ही तो हम सब आत्माओं का परम लक्ष्य भी होता है। महाराज जी भक्तों पर बनी रहे।

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