इस अल्पकालीन जीवन को सार्थक बनाने के लिए मानवता के कल्याण में लग जाए



वैसे तो मनुष्य की कामना अनन्त काल तक जीवित रहने की रहती है, परन्तु देह के साथ प्राणी मात्र के जीवन की भी एक सीमा है आयु बढ़ती है और देह क्षीण होती जाती है, और एक समय ऐसा आता है जब आध्यात्मिक शास्त्रोक्तानुसार कि शरीर के भीतर रहने वाली और संसार में  विभिन्न नामों से जानी जाने वाली चेतना निकल जाती है एवं मनुष्य को मृत मान कर इसकी देह को भिन्न-भिन्न रस्मों अनुसार पंचतत्व में विलीन कर दिया जाता हैै।

इस अल्पकालीन जीवन को सार्थक बनाने के लिए मानवता के कल्याण में लग जाए मानव को ‘मानवता’ का त्याग नहीं करना चाहिए। जैसे हम औरों से अपने प्रति व्यवहार चाहते हैं, वैसे ही दूसरों के साथ व्यवहार करना मानवता का धर्म है अपने को प्रदत्त कष्ट में जैसी पीड़ा का अनुभव स्वयं को होता है, वैसी ही पीड़ा दूसरों को देने में होती है एकात्मकता जानकर किसी को पीङा नहीं पहुँचाने का संकल्प लेना ही मानव धर्म है।

मानव धर्म ‘वसुधैव कुटुंबकम‍्’ की स्थापना करके प्रेमपूर्वक जीने की पद्धति सिखाता है मनुष्य का मौलिक और सबसे बड़ा धर्म मानवता ही है जो धर्म वैर सिखाता है, उसे बुद्धिमान लोग धर्म नहीं कहेंगे, वह धर्म होने का कोरा दंभ मात्र हो सकता है। जीवन में ऐसा खोखला जीवन न जी कर मानव को मानवता के कल्याणार्थ ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे चांद-सितारों से जगमग-जगमग नभ की भांति वसुन्धरा भी जगमगा उठे, उसी स्थिति में हम मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे।

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