बहुत पाप लगता है जिसका फल पीड़ादायक होता है

 
महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं कि:
दान लड़किन की सादी (शादी) में, गरीबो की मदद में देना चाहिए। भगवान जाने, जो दे वह जाने (और कोई नहीं), तब फल होता है। गुप्त दान, पुण्य -भगवान के यहाँ लिख जाता है। कहने से पुण्य छीन हो जाता है !! कितने भूखे मरते है, झोपडी टूटी है,कपडे फटें हैं, पेट कभी भरता नहीं है,-ऐसे (लोगो को) को दान देना चाहिए।
पद: पुण्य करौ सो ना कहौ,पाप करो परकास,
कहिते ते दोउ घटत है,बरनत तुलसी दास।।

हममें से बहुत से लोग विभिन्न कारणों से दान देते हैं, दूसरों की मदद करते हैं। कुछ लोगों का ऐसा करने के पीछे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, अपने लिए या अपनों के लिए कुछ लाभ पाना होता है अर्थात स्वार्थ होता है। अब ऐसा दान करना वास्तव में लाभ देता है या नहीं; या कितने समय के लिए लाभ देता है……या अलग बात है….फिर कुछ लोगों को दूसरों की मदद करने के पीछे यश बटोरना या ये कहें सुर्ख़ियों में रहना भाता है, कुछ को दूसरों की मदद करते हुए फोटो खिंचाना और फिर फेसबुक/ इंस्टाग्राम पर इन फोटो पर दूसरों की लाइक्स बहुत अच्छी लगती हैं। इन सब में कोई ख़ास बुराई नहीं है -हां ये अवश्य है कि ये सब थोड़ा कृत्रिम है (artificial है- real नहीं है)। इसलिए जब कभी हमारी अपेक्षा अनुसार लाइक्स नहीं आती हैं तो निराशा भी हाथ लगती है।
 
यदि दान, मदद करने से हमारा उद्देश्य पुण्य कमाना हैं, और कहीं ना कहीं हम अपने इस कृत की ईश्वर से, महाराज जी से, फल की अपेक्षा रखते हैं तो ऐसे दान से, मदद से जिसमें हमारा कोई ना कोई स्वार्थ निमित्त है (जैसे ऊपर हम चर्चा भी कर रहे हैं) - हमारा उद्देश्य पूरा होने वाला नहीं है!! महाराज जी ने हमें गुप्त दान के महत्त्व के बारे में समझाया है- ऐसा दान, ऐसी सेवा, ऐसी मदद जिसमें इस कृत की जानकारी जिसने किया और जिसके साथ किया - केवल ये लोग ही जानते हैं। अर्थात इस कृत का बखान ना हो। कम हो रही है लेकिन फिर भी हमारे देश में अभी भी बहुत गरीबी है - दुर्भाग्यवश। और इस सन्दर्भ में जो लोग, जितना भी योगदान कर सकते हैं उन्हें करना चाहिए।
 
कितने ही लोग हैं जो धन -राशि के अभाव में अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों का विवाह करने में असमर्थ है, कुछ को बच्चों की पढ़ाई में मदद की आवश्यकता है तो कुछ पैसे के अभाव में बीमारी का इलाज ठीक से नहीं करा पा रहे हैं। कहने का तात्पर्य है कि यदि हममें खोजने की इच्छा शक्ति हो, तो अपने आस- पास हमें अनेकों वंचित लोग मिल जाएंगे जिनकी हम मदद कर सकते हैं। महाराज जी के भक्तों को ऐसे लोगों के लिए गुप्त दान करना चाहिए -यदि हम ऐसा करने में सक्षम है। बहुत से लोगों के लिए, अपने और अपनों के लिए 2 समय के भोजन का प्रबंध करना आसान नहीं होता। ऐसे लोग हमें शहर में बहुत जगह मिल सकते हैं जैसे सरकारी अस्पताल के बाहर, रेल की पटरी के पास या स्टेशन के पास, भवन निर्माण के काम में लगे मज़दूर उनके परिवार जहाँ रहते हों, कुष्ठ आश्रम इत्यादि या ये कहें कि जहाँ कहीं भी वास्तव में वंचित लोगों का बसेरा हो।
 
महाराज जी के भक्तों को इन लोगों के भोजन के लिए यथासंभव प्रयत्न करना चाहिए- और इसके बारे में बखान किये बिना। जो लोग किसी कारणवश भोजन वितरण करने में असमर्थ हों, वे महाराज जी के उपदेश अनुसार खिचड़ी बंटवा सकते हैं - कुछ एक लोगों के लिए या बहुत से वंचितों के लिए भी - जिसका जैसा सामर्थ हो। थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, और एहतियात भी विशेषकर इस करोना के समय में, लेकिन ऐसे कर्म करने में निसंदेह अच्छा लगेगा, शांति मिलेगी। महाराज का आशीर्वाद मिलेगा। पुण्य तो मिलेगा ही और यहाँ पर ये बात बहुत ही आवश्यक है कि दान के लिए, मदद के लिए की गई अर्जित धन -राशि, अपनी ईमानदारी की कमाई से की गई हो, नहीं तो महाराज जी के उपदेश अनुसार ऐसे कर्मों का फल विपरीत हो सकता है। बहुत पाप लगता है जिसका फल पीड़ादायक हो सकता है।
 
इस सन्दर्भ में महाराज जी, तुलसीदास जी के दोहे की निमित्त हमें समझा रहे हैं की अपने पाप और पुण्य - इनके बारे में बात करने से - ये दोनों घट जाते हैं। महाराज जी के उपदेशों के अनुसार जो अच्छे कर्म हमने किये हैं, उनके बारे में बात ना करना ही हमारे लिए अच्छा है क्योंकि ऐसा करने से उन कर्मों से अर्जित पुण्य क्षीण हो जाते हैं। वैसे ही महाराज जी उपदेशों के अनुसार जो बुरे कर्म हमने किये हैं, उनको छुपाने के बजाय जब हम उन्हें स्वीकारते हैं - सर्वप्रथम अपने आप से तो हमारा कल्याण होता है। और तत्पश्चात ऐसे बुरे कर्मों का प्रायश्चित करने से उनके फल की तीव्रता का कम होना भी संभव है….यदि महाराज जी का आशीर्वाद हो तो।
 
महाराज की कृपा सब भक्तों पर बनी रहे।

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