रोहित सरदाना नायक थे , वे लंबे समय तक अपनी स्पष्टवादिता के लिए याद रहेंगे



रोहित सरदाना की मृत्यु पर असंख्य लोगों ने ठहाके लगाए, तो  शहाबुद्दीन की मौत पर जोरदार ठहाके लगे। टोकने पर दोनों पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि वो अटल जी, सुषमा जी की मृत्यु पर हँसे, तो वे फलाँ फलाँ पर हँसे... दोनों पक्षों के अपने अपने तर्क हैं, और दोनों अपने अपने कार्य से संतुष्ट भी हैं...

तनिक सोचिये तो, भारत जैसे देश में जहाँ 'दुश्मन की लाश को भी कन्धा' देने की परम्परा है, वहाँ यह मृत्यु पर अट्ठहास करने का रिवाज कहाँ से आ गया? हमारे यहाँ घर घर मे सुनाई जाने वाली कथाओं के अनुसार स्वयं बध करने के बाद भी भगवान राम न बाली की मृत्यु पर हँसे न रावण की मृत्यु पर... स्वतन्त्रता के बाद का ही इतिहास देखिये, क्या नेहरू की मृत्यु पर लोहिया हँसे थे? क्या इंदिरा की मृत्यु पर अटल हँसे थे? क्या अटल की मृत्यु पर मनमोहन सिंह हँसे? नहीं! फिर किसने शुरू की हँसने की यह निर्लज्ज परम्परा?

मैं बताता हूँ। लाशों पर हँसने की परम्परा शुरू हुई सन 1962 में, जब चीन से भारत की पराजय और भारतीय सैनिकों की वीरगति पर क्रूर कम्युनिस्टों ने ठहाके लगाए... भारत में वामपंथी आतंकवाद शुरू होने के बाद जब जब नक्सलियों ने भारतीय सैनिकों को मारा, तब तब उन गद्दार आदमखोरों ने ठहाके लगाए। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, पुलवामा हमले के बाद सारा देश रो रहा था, तब भी किन किन लोगों ने जश्न मनाया, यह किसने नहीं देखा? सैनिकों की हत्या को अपनी जीत बता कर उस विश्वविद्यालय के बूढ़े विद्यार्थियों ने किस तरह जश्न मनाया था, यह किसे याद नहीं होगा? इस देश को लाशों पर जश्न मनाना इन्ही वामी आदमखोरों ने सिखाया है, नहीं तो इस देश ने नरसिम्ह राव की मृत्यु पर फफक पड़े अटल को भी देखा है, और अटल की शवयात्रा में पैदल चलते अनेक बुजुर्ग कांग्रेसियों को भी देखा है।

चलिये, मैं रोहित और शहाबुद्दीन की मृत्यु पर दोनों ओर के नवयुवकों की बात को 'नई उम्र का जोश' मान कर छोड़ देता हूँ, पर रोहित की मृत्यु का जश्न मनाते बूढ़े और सीनियर पत्रकारों, लेखकों को क्या कहें? घिन्न आने लगती है जब एक सीनियर पत्रकार उन्हें सरकार का आदमी बता कर मजाक उड़ाते हुए पाँच करोड़ की बात करता है। परसो रोहित की मृत्यु पर एक अपने खेमे में प्रतिष्ठित वामपंथी बुद्धिखोर ने रोहित की नन्ही बच्चीयों के लिए कहा कि 'वे भी मर जाएं तो ठीक...' क्या इससे भी अधिक घिनौनी बात होगी कोई? क्या आपने इसके लिए किसी कम्युनिस्ट को शर्मिंदा होते देखा? नहीं... वे शर्मिंदा नहीं होंगे, बल्कि यही उनका ईमान है। यह मुर्दाखोरों का झुंड केवल और केवल लाश देखना चाहता है। वे यही करते रहे हैं, यही करते रहेंगे...

रोहित सरदाना नायक थे, वे लंबे समय तक अपनी स्पष्टवादिता के लिए याद रहेंगे। और अपनी तमाम बुराइयों के साथ साथ मुझे शहाबुद्दीन इसके लिए भी याद रहेंगे कि उन्होंने अपने क्षेत्र में क्रूर कामरेडों की कमर तोड़ दी थी।


(सर्वेश तिवारी श्रीमुख)

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