द्रोह मानने वाला, बिना अग्नि के जला करता है

 


महाराज जी भक्तों को उपदेश दे रहे हैं 

चाहे जितना भेष बनाकर तीर्थ, देश-देशान्तर घूमिये, पूजा पाठ करिये, यदि कपट है तो भगवान के भवन में प्रवेश न पा सकोगे। द्रोह मानने वाला, बिना अग्नि के जला करता है। न जगत में सुख और न परलोक में ही शान्ति।

हमारे लिए ये बहुत ही आवश्यक है की हम ये सोचें की जो भी हम कर रहे हैं, करने जा रहे हैं उसके पीछे हमारा उद्देश्य क्या है ? उससे हमारा क्या हित होने वाला है?  इस बात के महत्त्व के बारे में हम समय -समय पर इस पटल पर चर्चा करते रहे हैं। महाराज जी ने भी इस बारे में हमें सचेत किया है। क्योंकि हममें से अधिकतर लोग बिना सोचे- समझे ही कर्म करते हैं और फिर जो करते हैं उसका परिणाम प्रायः हमारे लिए अच्छा नहीं होता। 

जैसे की हममें से कुछ लोग  देश -देशांतर घूमते हुए तीर्थ स्थानों के दर्शन करते हैं। अब यदि इसका उद्देश्य पर्यटन है, हवा -पानी बदलना है तो इस बात के बारे में हमें जाग्रत रहना चाहिए। और यदि ऐसी यात्रा के उद्देश्य भक्ति है, मन की शांति है तो उसके किये हमें कुछ अतिरिक्त प्रयास/कर्म भी करने पड़ेंगे। 

वैसे तो ईश्वर सर्वव्यापी हैं, सब जगह हैं, सबमें हैं परन्तु तीर्थस्थान एक ऐसा स्थान होता है जिसे बहुत से भक्तगण ईश्वर की स्थान मानकर, बहुत समय से उनकी भक्ति करने आते हैं, कुछ जगह तो सदियों से। तो ऐसा स्थान जहाँ सदियों से भक्तिभाव ओत -प्रोत हो, वहां पर ईश्वर की विशेष उपस्थिति होती है, ईश्वर का विशेष प्रकाश होता है। जितना समय हम उस स्थान में रहेंगे, बहुत संभव है कि उतना समय हमें अच्छा लगेगा परन्तु उसके पश्चात् हमें इसका लाभ मिलेगा या नहीं -ये हमारे ऊपर निर्भर करता है।   

यदि हमने अपने अंदर बहुत से विकारों को जगह दी हुई है, जैसा की द्रोह, ईर्ष्या, छल -कपट इत्यादि तो तीर्थ स्थान के दर्शन/ यात्रा के कुछ समय बाद ही हम पुनः ऐसी ही वृत्ति में फंस जायेंगे। सुख शांति की अनुभूति अधिक देर तक नहीं टिक पाती है।  

जो व्यक्ति दूसरों के साथ ईर्ष्या, बैर की भावना रखता है वह अपना सबसे अधिक नुकसान करता है। क्योंकि जिसके लिए हम ऐसी भावना रखते हैं कभी -कभी उसे तो इस बारे में पता भी ही नहीं होता (यदि हम उसकी कोई हानि नहीं भी करते हैं) परन्तु हमारा अपना सुख -चैन छिन जाने की सम्भावना बढ़ जाती है।

और यदि हम ऐसी भावनाओं में बहकर या ये कहें की इनकी वृत्ति होने पर छल -कपट करके अपने -परायों को कष्ट पहुंचाते हैं, दुःख देते है तो धार्मिक ग्रंथों को पढ़ना, मंदिर जाना, तीर्थ स्थानों के दर्शन करना, भजन -कीर्तन-सत्संग करना इत्यादि -हमें उसका फल नहीं मिलेगा जैसे ऊपर चर्चा की गई है। हमारे भाव तो इन सब गतिविधियों होते ही नहीं हैं।  जो पाप लगेगा वो ऊपर से। फिर ना इस लोक में सुख -चैन मिलेगा न उस लोक में। महाराज जी तो यहाँ तक कहते हैं कि छल- कपट जैसे बुरे कर्म करके हम ईश्वर के समीप जा ही नहीं सकते।

महाराज जी के भक्तों को छल -कपट, द्रोह -बैर इत्यादि से बचना चाहिए। जैसा ऊपर कहा गया है, हमें चैतन्य होकर कर्म करने की कोशिश करनी चाहिए अर्थात स्वयं से प्रश्न करते रहना है की जो हम कर रहे हैं वो क्यों कर रहे हैं और उसके करने से क्या अंततः हमारा हित ही निश्चित है ?? और यदि नहीं तो ऐसा कर्म क्यों करना ?

महाराज जी हमें समय -समय पर समझाते रहे हैं कि हम सब अपने पूर्व कर्मों के अनुसार से अपना -अपना भाग्य लेकर इस संसार में आये हैं और वैसे ही अपने -अपने जीवन में दुःख -सुख की परिस्थितियां को पाते हैं। तो फिर दूसरे के साथ अपनी तुलना तो तर्कहीन ही हुआ !! इसीलिए जो प्राप्त है वो पर्याप्त है को मानने वाले प्रायः शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

कितना अच्छा होता अगर हम महाराज जी के उपदेश अनुसार दूसरों की सफलता पर, उनकी खुशियों में ह्रदय से आनंदित हों या होने की वास्तविकता में कोशिश करें (ये संभव है- अगर इच्छा शक्ति हो तो)।

इससे हमारे जीवन में संतोष आएगा शांति आएगी सुख आएगा जो और सुखों की तरह थोड़ी अवधि के लिए नहीं बल्कि लम्बी अवधि वाला होगा संभवतः शाश्वत भी हो सकता है और हमें क्या चाहिए जीवन में  

महाराज जी की कृपा सब भक्तों पर बनी रहे।

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