जो करना चाहिए था, उसको सर्वथा भूला दिया



इस संसार में मनुष्य के सुख-दु:ख, उत्थान-पतन का प्रतिफल तो अनंत काल तक आत्मा के सामने ही आने वाला है।

इसलिए शरीर मोह की सीमा होनी चाहिए उसकी पूर्ति में इतना न उलझ जाना चाहिए कि आत्मिक स्वार्थों की पूर्ण उपेक्षा होने लगे। 

उसके लिए फुरसत न मिलने आर्थिक तंगी का बहाना करके मन बहलाया जा सकता है, पर जब शरीर वृद्ध, रुग्ण अथवा मृत्यु के निकट होता है, तब भूल समझ में आती है और सूझता है कि इस तुच्छ शरीर के मनोरंजन में बहुमूल्य मानव जीवन चला गया और जो करना चाहिए था, उसको सर्वथा भूला दिया गया है।

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