अधिकतर लोगों के जीवन में एक भाग सुख का और तीन भाग दुःख का होता है


महाराज जी उपदेश दे रहे हैं। खान -पान और प्राण का लोभ लगा है इससे नीचे गिर जाते हैं कर्म की गती कर्म करने से ही मिटती है कौन कर्म निष्कपट होकर भगवान में लग जाय -तब मिट जाय जितने भक्त हुए हैं वे करनी करके हुए हैं मनुष्य का अन्मोल तन बृथा में न जाय कमर कसकर -पर उपकार में लग जाय। तुम जहाँ से आये हो वहाँ कैसे पहुँचोगे -बिना शुभ काम किये ??
 
पढ़ते हो, सुनते हो और लिखते हो, दूसरों को समझाते हो वहाँ तिल-तिल का हिसाब लिखा जाता है फिर अपने मन का करते हो, जो तुम्हारे ऊपर मालिक है उससे नहीं डरते हो मौत को भूले हो' यदि हम सब नहीं तो, हममें से अधिकांश लोग प्रारब्ध को झेलते हुए या पूर्व में किये गए कर्मों के फलस्वरूप अपने जीवन में कोई ना कोई युद्ध लड़ रहे हैं, समस्याओं से जूझ रहे हैं, पीड़ित हैं अधिकतर लोगों के जीवन में एक भाग सुख का और तीन भाग दुःख का होता हैऔर ऐसा भी नहीं है ये सब हमारे इसी जीवन में हो रहा है ये सिलसिला तब से चल रहा है जब हमें मानव शरीर मिला था, 84 लाख योनिओं के बाद जिनमें हमें पशु, पक्षी इत्यादि का शरीर मिला था और ये चलता ही रहेगा यदि हम इस बारे में कुछ न करे
 
जब ईश्वर ने हम आत्माओं को मानव शरीर दिया तो शरीर के द्वारा करने वाले कर्म और उन कर्मों के फल की अपनी स्वचालित और त्रुटिहीन प्रक्रिया भी दी फिर बुद्धि के साथ साथ ही साथ विवेक भी दिया जिसका यदि हम चाहें तो उपयोग करके अर्थात जागरूक रहकर कर्म कर सकते हैं और अपना जीवन संवार सकते हैं जैसा हम समय -समय पर चर्चा भी करते रहते हैं उसने पशु पक्षियों को बुद्धि तो दी, पर विवेक नहीं दिया। तभी महाराज जी हमें, हर जन्म में माँ की कोख से संसार में आना और फिर अर्थी पर चढ़ कर चले जाने की इस प्रक्रिया से बाहर निकलने के बारे में भी बताते रहे हैं मुक्ति और सबसे महत्वपूर्ण मोक्ष के बारे में समझाते रहे हैं अर्थात हम आत्माएं का उस परम आत्मा से अलग होकर इस संसार में आना और अंततः हर आत्मा का अपने मूल, अर्थात उस परम आत्मा से मिलन का लक्ष्य और ये मानव शरीर के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है तभी कहते हैं की कि मानव शरीर अनमोल होता है।
 
मुक्ति, मोक्ष का मार्ग सरल नहीं होता है कठिन साधना करनी होती है इसमें इच्छाशक्ति, दृढ़ संकल्प और अत्यधिक धैर्य की आवश्यकता होती है और सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन के बिना तो ये संभव ही नहीं है कर्म और कर्मफल की प्रक्रिया से तो मुक्ति चाहिए ही होती है अब हम लोग इस मार्ग पर चलना चाहें या न चाहें, पर बुरे कर्म कम और अच्छे कर्म अधिक करने से हमारे जीवन में दुःख कम होना निश्चित है सुख - शांति में वृद्धि भी होगी। हमारा दुःख देखकर महाराज जी को भी दुःख होता है इसीलिए वे हमें बुरे काम, बुरे कर्म कम से कम करने का और परमार्थ/परस्वार्थ पर चलने का मार्ग अपने उपदेशों के माध्यम से दिखाते रहे हैं। चालीदास जी जैसे ईश्वर के महान भक्त के इस उपरोक्त उपदेश को महाराज जी ने संभवतः उन लोगों के सन्दर्भ में कहा है जिनकी आजीविका का माध्यम, भक्ति के मार्ग या भक्ति से जुडी गतिविधियों हैं
 
इनमें अधिकांश लोग खान- पान,धन, प्राण के लोभ में बहकर भक्ति के मूल सिद्धांतों पर आचरण नहीं करते दूसरे विकारों से भी ग्रसित होकर अच्छे -बुरे कर्म करते हैं - ये भली भांति जानते हुए की ईश्वर सब देखता है उनमें से जिन लोगों ने वेद -पुराण अथवा अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है उसे वे पढ़ते , लिखते, दूसरों को समझाते तो हैं पर स्वयं उस पर नहीं चलते है ऐसा पाखंड 50-60 साल पहले होता था जब महाराज जी ने संभवतः ये उपदेश दिया होगा वर्तमान में ही इस स्थिति में सुधार तो कठिन ही है
 
महाराज जी सबका भला करें।

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