विषमता रुपी विष कंठ तक ही रहने दें



विषमता रुपी विष कंठ तक ही रहने दें, चित्त (मन) तक मत ले जायें अगर आपके भीतर प्रवेश कर गया तो यह आपके जीवन की सारी खुशियों को जलाकर भस्म कर देगा।

भगवान् शिव का एक नाम नीलकंठ भी है समुद्र मंथन के समय निकले विष को लोक कल्याणार्थ भगवान शंकर पान कर गये विष को ना उन्होंने अपने भीतर जाने दिया और ना ही मुख में रखा कंठ में रख लिया।

जीवन है तो पग-पग पर बुराइयों का सामना भी करना पड़ता है जीवन को आनन्दपूर्ण बनाने के लिये आवश्यक है कि जो बातें हमारे लिये अहितकर हों हम उन्हें ना अपने मुख में रखें और ना अपने भीतर जाने दें शिवजी की तरह पचा जायें।

विषमता रुपी विष अगर आपके भीतर प्रवेश कर गया तो यह आपके जीवन की सारी खुशियों को जलाकर भस्म कर देगा इसलिए इसे कंठ तक ही रहने दें, चित्त (मन) तक मत ले जायें।

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