बिना किसी अपेक्षा के ज़रूरतमंदों की मदद करने से बड़ा कोई धर्म नहीं हो सकता

प्रश्न: प्रभो, दया-धर्म की क्या महिमा है?

उत्तर: (श्री गुरु महाराज जी): परमारथ और परस्वारथ दो दल हैं।

परमारथ अर्थात ईश्वर को प्राप्त करने हेतु पूजा पाठ, जप, ध्यान करना। परस्वार्थ -दया धर्म करना। जो दोनों डन्डा पकड़े हैं उनका दर्जा बड़ा ऊँचा है। कोई भूखा प्यासा आ गया, तुम पूजा -पाठ करते हो, दूसरा वहाँ कोई नहीं है, तो तुम फौरन उठकर उसे भोजन दे दो। अगर प्यासा है तो पानी दे दो। फिर आकर अपना नेम (पूजा) करो। 
दया -धर्म सब धर्मों से ऊँचा है।
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निसंदेह, महाराज जी ने हमें कई बार समझाया है कि बिना अपने किसी स्वार्थ के, बिना किसी अपेक्षा के ज़रूरतमंदों की मदद करना -अपने सामर्थ के अनुसार, इससे बड़ा कोई धर्म हो ही नहीं सकता। स्वार्थ के लिए की गई मदद, सेवा का हमें लाभ नहीं मिलता और महाराज जी यहाँ पर हमें सच्चे भक्त की परिभाषा कितने सरल शब्दों में समझा रहे हैं -वे जो सच्चे भाव से जप, पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, सत्संग, इत्यादि करते हैं, विनम्र रहते हैं और साथ ही साथ निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद भी करते हैं- जैसा भी उनका सामर्थ हो। भावों में सच्चाई लाने के मार्ग महाराज जी हमें समझाते रहे हैं जिनकी चर्चा हम समय- समय पर इस पटल पर करते भी रहते हैं।
 
विनम्रता कैसी होनी चाहिए इस बारे में भी हम चर्चा करते रहे हैं। ऐसा ऐसा सच्चा कोई भी बन सकता है जिसमें इच्छाशक्ति हो और दृढ़ सकल्प हो। यदि हमारे पूजा -पाठ, भजन कीर्तन इत्यादि करते समय कोई भूखा -प्यासा, कोई वंचित आ जाए तो और कोई और विकल्प ना होने की परिस्थिति में अपनी पूजा को कुछ समय के लिए रोक कर उसकी मदद करना हमारा धर्म है। महाराज जी कहते हैं दया धर्म सबसे ऊपर होता है। भगवान तो सब कुछ देखते ही हैं !! यदि वे हमारे ही जैसे अपने किसी अंश की मदद करने के लिए, हमें माध्यम बना रहे हैं तो हमें ऐसे पुण्य कमाने के अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। यहाँ पर महाराज जी हमें प्रत्यक्ष रूप से जीवन में सुख और शांति की वृद्धि करने का मार्ग दिखा रहे हैं।
 
बस जैसा ऊपर कहा गया है, हमें अपने इस कर्म का हमें प्रचार-प्रसार करने से बचना होगा वर्ना अर्जित पुण्य खो जाएगा। यदि अपेक्षित मदद मदद करने में किसी कारण से हम असमर्थ हैं तो विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर हम क्षमा मांग सकते हैं पर वंचित से दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए। बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के दूसरों की मदद करने से हमारी आत्मा को प्रसन्नता होती है और जब आत्मा प्रसन्न होगी तो उसका मूल, अर्थात वो परम -आत्मा भी प्रसन्न होगा। फिर हमें एक ऐसे आनंद की प्राप्ति होगी जो की खाने -पीने, मनोरंजन अथवा भौतिक वस्तुओं से प्राप्त आनंद की तरह कम अवधि वाला नहीं होगा - वो आनंद शाश्वत होगा। फिर हम महाराज जी के कृपा के पात्र बन सकेंगे और उस परम आत्मा के समीप भी जा सकेंगे। अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए, सफल करने के लिए और भला हमें क्या चाहिए ?
 
महाराज जी सबका भला करें।

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