भगवान किसी से नाराज़ नहीं होते हैं, बस कर्म करो

प्रश्न क्या भगवान नाराज हैं? तकलीफ बहुत है। उत्तर (श्री गुरु महाराज जी का) भगवान नाराज नहीं होते। कर्मानुसार सुख-दुख जीव पाते हैं जो कहे भगवान नाराज हैं वह अपनी मौत और भगवान को खुद भूला है। ये प्रश्न किसी भक्त ने उस समय महाराज जी से पूछा होगा जब वह तकलीफ में होगा/होगी ऐसे समय में हमें भगवान की याद भी बहुत आती है परन्तु महाराज जी हम सब को नियमित रूप से समझाते रहे हैं कि भगवान किसी से नाराज़ नहीं होते हैं किसी का बुरा नहीं चाहते हैं बस कर्म करो और उसके फल का सामना करो की अपनी व्यवस्था से बंधे हैं ये एक आदर्श व्यवस्था है।
 
जीवन में जब हम दुखों का सामना कर रहे होते हैं, मुसीबत में होते हैं तो हममें से कुछ लोगों के दिमाग में विचार आता है कि लगता है भगवान नाराज़ है कुछ तो ये तक कहना शुरू कर देते हैं की भगवान कहाँ है। तो क्या हम लोग ये गारंटी लेकर पैदा हुए थे की हमें कोई दुःख ही नहीं मिलेगा या कुछ परिशानियाँ होंगी भी तो बहुत हलकी -फुलकी…. शायद असलियत तो ये है की मुसीबत के समय हममें से जो लोग सोचते हैं कि भगवान नाराज़ हैं, ऐसे में वे भगवान को ही भूले होते हैं या ये कहें भगवान की उस अद्वितीय, त्रुटिहीन और स्वचालित व्यवस्था के बारे में भूल जाते हैं जिसमें हमारे प्रत्येक कर्म का फल हमें निश्चित मिलना ही मिलना है -और अधिकतर हमारे वर्तमान जन्म में ही फिर चाहे हम धनवान हो या निर्धन, पढ़े-लिखे, विद्वान् हो या अनपढ़ इत्यादि, और जाति और धर्म से तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता है भगवान की व्यवस्था हर मनुष्य के लिए बराबर है !! और ऐसी व्यवस्था का विफल होना भी असंभव है !! जो किया है उसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा !!
 
भगवान की इस व्यवस्था के बारे हम तब भी भूले हुए होते हैं जब हममें से कुछ लोग बेईमानी से, भ्रष्टाचार करके, दूसरों को धोखा देकर, छल -कपट से रूपये कमा रहे होते हैंअच्छा अपने या अपनों के आराम -लाभ के लिए जब इस तरह हम ये सब धन-संपत्ति संचित कर रहे होते हैं तब स्वयं को ये तक नहीं पता होता है कि इसका भोग करने के लिए हम या हमारे अपने जीवित भी रहेंगे या नहीं …….भले ही पहले हम ये कम सोचते थे या नहीं सोचते थे कि हमारी मृत्यु की घड़ी कभी भी आ सकती परन्तु ईश्वर ने पिछले 10-12 महीने में इस बात को हमें याद तो दिला ही दिया है कि उसने हम सब की मृत्यु निश्चित कर रखी है वो कल भी हो सकती है, या कुछ महीने या साल बाद भी जो ये बात भूल जाते हैं वे कहीं ना कहीं ईश्वर को ही भूलने की गलती करते हैं।
 
अपने पैसे के घमंड में या फिर ऐसे ही कभी-कभी हम दूसरों को निम्न समझकर उन्हें दुःख देते हैं उनकी आँखों में आंसू ले आते हैं। कुछ लोग अपनी जाति को लेकर दूसरी जाति के लोगों को निम्न समझते हैं, उन्हें दुःख पहुंचाते है परन्तु हम या हमारे अपने दुर्भाग्यवश जब किसी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं और हमें खून की ज़रूरत पड़ जाती है तो क्या ऐसी स्थिति में हम जात -पात देखते हैं नहीं ना !! तो फिर इस मामले में पाखंड क्यों ? फिर चार किताबें पढ़ने के बाद कुछ लोगों को उसका जो अहंकार हो जाता है वह तो बहुत बुरा होता है इस अहंकार में लोग दूसरों को कभी -कभी बहुत दुःख देते हैं। कहने का तात्पर्य है की हम लोग दूसरों के लिए अपने ह्रदय में बैर रखकर या अपने किसी ना किसी अहंकार में, अपने या अपनों के मोह में जब हम दूसरों को दुःख देते हैं तो हम भगवान को भूल जाते हैं या याद ही नहीं रहता है की वो परम आत्मा सब देख रहा है, सबको देख रहा है और फिर जब वो अपनी व्यवस्था की हिसाब से हमारे ऐसे कर्मों का हमें फल देता है तो हम लोग कहते हैं लगता है की भगवान नाराज़ है, बहुत तकलीफ है......
 
तो जैसे महाराज जी हमें यहाँ पर समझा रहे हैं, भगवान कभी -किसी से नाराज़ नहीं होते हैं हाँ अपनी व्यवस्था के हिसाब से हम सबको हमारे अच्छे -बुरे कर्मों का फल अवश्य देते हैं अच्छे कर्मों का भी !! तभी तो हमारे जीवन में ख़ुशी और हर्षोउल्लास के पल भी आते हैं। ईश्वर तो दयालु है तभी तो हमारे बुरे कर्मों का फल देते हुए भी (जब हम तकलीफ में होते हैं), वो इस समय का उपयोग, हमें कुछ ना कुछ सीख देने के लिए भी करता है जिससे आगे -पीछे हमारा कल्याण ही निहित होता है कठिन समय को सहने की शक्ति हमें सद्गुरु के लिए हमारी आस्था, हमारे सच्चे भावों से मिलती है हमारे लिए बहुत अच्छा होगा यदि हम कर्म करने के पहले चैतन्य -जागरूक होने का प्रयत्न करें और एक पल के लिए सोंचें की जो हम करने जा रहे हैं वो क्यों कर रहे हैं, ऐसा तो नहीं है इसका फल हमें बाद में दुःख ही देगा या ऐसा कर्म कहीं महाराज जी के उपदेशों के विपरीत तो नहीं है ?
 
इस सन्दर्भ में इच्छाशक्ति, धैर्य और कोशिश करने से हमें तकलीफ कम होगी और हमारा जीवन जीना सरल हो जायेगा सुख और शांति भी निश्चित ही आएगी।
 
 
महाराज जी सबका भला करें।

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