देश की मीडिया भी ओलंपिक खिलाड़ियों को मार रही है मिठाई खिलाकर


हमारे गाँव के बुजुर्ग कहते हैं "यदि कोई शत्रु मिठाई खिलाने से ही मर जाता हो तो उसे जहर नहीं देते।" हमारे देश की मीडिया भी ओलंपिक खिलाड़ियों को मिठाई खिला कर मार रही है। किसी खिलाड़ी ने एक लीग मैच जीत लिया तो अगले ही क्षण उसके घर के आगे मजमा लग जाता है। सारे चैनलों पर उसकी स्तुति गायी जाने लगती है।

ऐसा लगता है कि अब उसके पास करने को कुछ नहीं है, वह हर ऊंचाई छू चुका है। यह एक अलग प्रकार का प्रेशर है जो किसी भी व्यक्ति को ध्वस्त कर सकता है। कोई खिलाड़ी हार जाय तो "मैच भले हार गया पर दिल जीत लिया" वाला तमाशा शुरू। जैसे खिलाड़ी बचपन से दिल जीतने के लिए प्रैक्टिस कर रहा था। जैसे ओलंपिक में दिल जीतने पर भी मैडल मिलते हों। सवा सौ करोड़ की जनसंख्या वाला देश यदि पदक तालिका के टॉप पचास में भी नहीं है, तो इसका एक कारण यह मीडियाई बकलोली भी है। आपको क्या लगता है, यदि किसी विद्यार्थी को मुख्य परीक्षा के पहले ही यह बताया जाने लगे कि तुम्हारा परीक्षा में बैठना ही बहुत बड़ी जीत है, तो वह पास होगा?

युद्ध में गए किसी सैनिक को कहा जाय कि सीमा पर आ कर ही तुमने देश का दिल जीत लिया है तो वह युद्ध लड़ पायेगा? नहीं! अगर कोई खिलाड़ी ओलंपिक जैसे आयोजन में देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो उसे हर क्षण याद होना चाहिए कि वह विश्व के दूसरे सबसे बड़े देश का प्रतिनिधि है और वह गोल्ड जीत कर ही अपने देश की प्रतिष्ठा बचा सकता है। इसके अतिरिक्त कही गयी सारी बातें झूठ हैं, मन बहलाने के लिए हैं। पर यह सच है कि हम उसे यह बात समझने ही नहीं देते। वैसे बात केवल मीडिया की ही नहीं है, हमारे देश की मानसिकता ही यही है। हम अपने को गोल्ड के लायक समझते ही नहीं। खिलाड़ी अगर एक लीग मैच भी जीत गया, तो हम उसे हीरो मान लेते हैं। या मीडिया उसे हमसे हीरो मनवा लेती है। 

सन 2003 का क्रिकेट विश्व कप मैच चल रहा था। शुरू के एक दो लीग मैचों में भारतीय टीम ने बहुत बुरा प्रदर्शन किया थी। फिर अचानक देश मे उनका विरोध शुरू हो गया। खिलाड़ियों के घरों पर पत्थर फेंके गए, प्रशंसकों ने खिलाड़ियों की शव यात्रा निकाली, और भी बहुत तमाशे हुए। सौरव गांगुली के भाई स्नेहाशीष गांगुली ने तो मीडिया के सामने यह तक कह दिया,"चले आओ भाई! तुमसे नहीं हो पायेगा..." फिर अगले दिन से ही दुनिया ने भारतीय टीम को पूरी तरह बदलते देखा। बेकार दिख रही टीम ने फाइनल खेला। बात विरोध प्रदर्शन की नहीं है, बात यह दिखाने की है कि हम अपने खिलाडियों से चाहते क्या हैं। तब देश ने दिखाया था कि उन्हें जीत चाहिये, तो टीम जीती थी। उसी विश्वकप का फाइनल याद कीजिये!

तब मैच देख रहा लगभग हर दर्शक इस बात से सहमत था कि फाइनल मैच में भारतीय टीम खेलने के लिए खेल रही थी और ऑस्ट्रेलियन टीम जीतने के लिए खेल रही थी। तब भी यही कारण था, फाइनल में पहुँचते ही मीडिया में भारतीय टीम को इसी तरह कंधे पर उठा कर उनके जीतने की ललक को मार दिया था। भारतीय दल की पराजय के और भी अनेक टेक्निकल कारण हैं, पर एक मनोवैज्ञानिक कारण यह भी है। अगले चार वर्षों में उन दूसरे कारणों के साथ साथ इस बेवकूफी को भी सुधारने का प्रयास होना चाहिये। वरना तब भी हम केवल दिल ही जीतेंगे।


सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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