राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है- अन्नपूर्णा देवी

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 7 सितम्‍बर, 2021 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शिक्षक पर्व के उद्घाटन सम्मेलन को संबोधित किया। उद्घाटन सम्मेलन के बाद वर्तमान वर्ष के मूल विषय- गुणवत्ता एवं संधारणीय स्‍कूल : भारत में स्‍कूलों से शिक्षणपर एक तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया। इस अवसर पर शिक्षा राज्य मंत्री अन्नपूर्णा देवी मुख्य अतिथि थीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति के अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन ने सत्र की अध्यक्षता की। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रो. जे. एस. राजपूत और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी इस अवसर पर उपस्थित थे।

इस अवसर पर अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि राष्ट्र का विकास शिक्षा पर निर्भर है क्योंकि शिक्षा राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। इसलिए बच्चों का क्षमता निर्माण जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि शिक्षक और बच्चे दोनों एक साथ सीखें, उन्हें स्थानीय कौशल भी सीखना चाहिए और वर्तमान समय में शिक्षा को अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए अनुभव आधारित शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि गुणवत्ता और संधारणीयता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अन्नपूर्णा देवी ने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि इस सम्मेलन से जो विमर्श और विचार सामने आएंगे, वे हमारे देश की शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने के हमारे प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को साकार करने में मदद करेंगे।

कस्तूरीरंगन ने इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के आयोजन में शिक्षा मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की, जिसमें प्रधानमंत्री ने आगामी सत्रों के लिए विचार-विमर्श का दौर शुरू किया। साथ ही, उन्‍होंने राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए इतने कम समय में एनईपी के लक्ष्यों को साकार करने के लिए शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्‍द्र प्रधान द्वारा की गई पहलों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के प्रकोप के कारण कुछ व्यवधानों के साथ-साथ बच्चों में शिक्षण का ह्रास हुआ और उम्मीद है कि सम्मेलन के दौरान इनमें से कई समस्‍याओं और चुनौतियों का समाधान किया जाएगा। प्रो. जे. एस. राजपूत ने कहा कि शिक्षकों के सम्मान को बहाल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को यह भी याद रखना चाहिए कि उन्हें पहले बच्चे को जानना चाहिए, बच्चे के मन को समझना चाहिए और याद रखना चाहिए कि कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है लेकिन सीखा जा सकता है। प्रो. राजपूत ने कहा कि सीखना भीतर का खजाना है, शिक्षक केवल शिक्षार्थियों को भीतर से खजाने का एहसास करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

प्रो. राजपूत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि स्कूल के प्रति अपनेपन की भावना को महसूस करना माता-पिता, प्रधानाचार्यों, शिक्षकों और समुदाय की सामाजिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि महामारी ने हमें सरकारी स्कूलों के वातावरण में पहुंच, सुरक्षा और शिक्षण की गुणवत्ता, शिक्षक-छात्र अनुपात आदि के मामले में सुधार करने का मौका दिया है। उन्होंने अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा कि विश्व में भारत की समृद्ध शैक्षिक विरासत के गौरव को फिर से स्थापित करने के लिए तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं : आजीवन सीखना, सीखने के लिए शिक्षण और एक साथ रहना सीखना। एनसीईआरटी के निदेशक प्रो. श्रीधर श्रीवास्तव ने कॉन्क्लेव के समापन सत्र में प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने ऑनलाइन मोड में शिक्षा का समर्थन करके, वैकल्पिक शैक्षणिक कैलेंडर, प्रज्ञाता दिशानिर्देश और सहायक शिक्षकों के लिए निष्ठा 2.0 ऑनलाइन प्रशिक्षण मॉड्यूल जैसे अध्‍यापन-शिक्षण संसाधनों को विकसित करके महामारी की स्थिति के दौरान एनसीईआरटी द्वारा निभाई गई सकारात्‍मक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस वर्ष का शिक्षक पर्व ‘‘संपूर्ण-विद्यालय’’ दृष्टिकोण अपनाता है; जो एक पाठ्यक्रम से परे है और स्कूल सुविधा की संपूर्ण योजना, संचालन और प्रबंधन का समाधान प्रस्‍तुत करता है। 

उन्होंने कहा कि शिक्षक पर्व के दौरान आगामी नौ राष्ट्रीय वेबिनार विभिन्न विषयों पर केन्द्रित होंगे, जो पर्व से जुड़े सभी लोगों को स्कूलों और शिक्षकों से सीखने में मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी स्कूलों से मिली सीख को राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ) में शामिल करेगा, जो फिलहाल विकास के चरण में है। अनीता करवाल ने अन्नपूर्णा देवी, डॉ. के. कस्तूरीरंगन, प्रो. जे. एस. राजपूत और सभी वक्ताओं को धन्‍यवाद दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षकों द्वारा की गई कुछ पहल आंखें खोलने वाली हैं जैसे कि ग्रेड I के लिए उद्यमिता शुरू करना, प्रकृति से परिचय, ये सीखने को वास्तविक जीवन से जोड़ने के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि संधारणीयता कायम करने के लिए स्कूल, समाज और माता-पिता की क्षमता का निर्माण करने की आवश्यकता है।

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