धनी व्यक्ति को सुखी होने के लिए विनम्र होना चाहिए

 
महाराज जी उपदेश दे रहे हैं कि:
हमें किसी संत ने लिखाया है-
धन-मद, बल- मद, रूप- मद, विद्या- मद ये चारी।
भव सागर की वारी में,पकड़ी देत है डारी। (वारी=जल)

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हममें से बहुत से लोग किसी ना किसी प्रकार के अहंकार से ग्रसित होते हैं - मेरे पास बहुत धन है -कितनी संपत्ति है, मैं सुन्दर हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं बलवान हूँ, मेरी जाति उससे श्रेष्ठ है, मैं ईश्वर/गुरु का सबसे बड़ा/बड़ी भक्त हूँ, मेरा ओहदा उससे बड़ा है और ना जाने क्या क्या … इसलिए मैं दूसरों से बड़ा/बड़ी हूँ …. श्रेष्ठ हूँ…… इस उपदेश में संभवतः महाराज जी हमें समझा रहे हैं कि इस संसार रूपी भव सागर में धन- संपत्ति का मद, बल- शक्ति का मद, रूप- सुंदरता का मद और विद्या का मद - इस तरह के विभिन्न अहंकार, हमें इस संसार में बांधें रखते है (हालाँकि महाराज जी ने यहाँ पर हमें समझाने के लिए हमारे 4 प्रकार के अहंकार की ही व्याख्या की है) !!
 
मद/घमंड/अहंकार से ग्रसित होकर हम बुरे कर्म करते रहते हैं और फिर ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार उनका बुरा फल भोगने के लिए हम संसार में जन्म लेते रहते हैं (क्योंकि सारे कर्मों का फल एक ही जन्म में मिलना संभव नहीं होता है) । या ये कहें की इस प्रक्रिया में हम बार -बार, अपने हर जन्म में, माँ की कोख से संसार में आते रहते हैं और फिर अर्थी पर चढ़ कर जाते रहते हैं और इन दोनों के बीच में दुःख- सुख पाते रहते हैं -जिसमें दुःख का अनुपात प्रायः कहीं अधिक होता है। फलस्वरूप हमारा इस संसार रूपी भव सागर से पार निकलना -हमारा उद्धार होना -बहुत कठिन हो जाता है। अहंकार के रहते हमें ईश्वर प्राप्त नहीं हो सकते हैं।
 
प्रायः माया का अहंकार से सीधा सम्बन्ध होता है। माया अर्थात जो है उसके ना होने का और जो नहीं है उसके होने का भ्रम। जिन लोगों को अपने धनी होने का या बहुत सी संपत्ति होने का मद है, घमंड है - क्या वाकई में वे पूर्णतः सुखी हैं, क्या उनके जीवन में शांति है ?? संभवतः नहीं …… तो फिर ऐसा अहंकार किस काम का ? धन तो सुख प्राप्ति का साधन है (वो भी प्रायः आजीवन नहीं) , पर रुपया -पैसा -धन स्वयं सुख नहीं है!! धन -संपत्ति होना अच्छी बात है और ये कहीं ना कहीं उनके ही हिस्से में आती है जिनके कर्म अच्छे हों - विशेषकर पूर्व जन्मों के क्योंकि तभी वे इस जन्म में या तो धनी परिवार में जन्म लेते हैं या फिर उनके इस जन्म में धनी बनने के लिए किये गए कर्मों का फल वो परम आत्मा जल्दी दे देता है। धनी व्यक्ति को सुखी होने के लिए विनम्र होना चाहिए और ज़रूरतमंदो की बिना किसी अपेक्षा के मदद करनी करनी चाहिए।
 
जिनको अपने बलवान होने पर बहुत अहंकार है, मद है तो उन्हें ये बात याद रखनी चाहिए के ये बल उम्र के साथ ढलने लगता है। और यदि हमने अपने रसूख वाला/ बलशाली होने के घमंड में दूसरों को दुःख पहुँचाया है तो इसका फल जब वो परम आत्मा हमें देगा तो पीड़ा हो सकती है, विशेषकर बुढ़ापे में जब शरीर शिथिल हो जाता है, दुर्बल हो जाता है और हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। इसलिए बलवान व्यक्ति को भी विनम्र होना चाहिए और अपने बल को उपयोग, निस्वार्थ भाव, से उन जरूरतमदों की मदद करनी चाहिए जिनमें उनके बराबर बल ना हो। रूप के मद के ग्रसित लोगों को तो इस बात का एहसास, अनुभूति ही पर्याप्त है की ये जब तक है, तब तक ही है और उम्र के साथ ढल जाएगा। फिर तकलीफ हो सकती है।
 
इसलिए उस परम आत्मा के प्रति कृतज्ञ रहें की उसने आपको सुन्दर बनाया है और दूसरों के प्रति विनम्र रहें, विशेषकर जिन्हें आपके जैसे रूप ना मिला हो और सबसे बुरा या आत्म विनाशकारी तो कुछ दिव्य ग्रन्थ के जानकार लोगों का अपने आप को ज्ञानी समझने का घमंड है, अहंकार है, मद है !! ऐसे लोग उस ज्ञान के अनुसार आचरण नहीं करते जिसका उन्होंने अध्यन किया है। ज्ञानी होने के मद में प्रायः ऐसे लोगों की अपेक्षाएं दूसरों से बढ़ जाती हैं कि वे लोग ऐसे किताबी ज्ञानी लोगों का (अधिक) आदर करें। और ऐसा ना होने पर वे दूसरों के साथ कभी -कभी दुर्व्यवहार तक करते हैं, उन्हें दुःख पहुंचाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के जानकर होने के मद में किये गए बुरे कर्मों के फल मिलने पर ऐसे लोगों को फिर बहुत तकलीफ होगी। ऐसे मद के फलस्वरूप सार्वजानिक अपमान होने की सम्भावना भी अधिक होती है। और जिन्होंने ऐसे किताबी ज्ञान को अपनी आजीविका चलाने का साधन बना रखा है वे भी साधारण जन को बहुत समय तक भ्रमित नहीं कर सकते।
 
उनकी आजीविका पर भी बुरा असर पड़ सकता है। अल्पावधि ख्याति प्राप्त करने की होड़ में दौड़ने के बजाय ऐसे किताबी ज्ञानियों के विनम्र रहने में ही उनका कल्याण है। विद्या विनय शोभते अर्थात विद्या और ज्ञान को विनय यानि नम्रता ही शोभा देती है। महाराज जी के भक्तों को जहाँ तक हो सके किसी भी अहंकार से बचने की कोशिश करनी चाहिए (जाग्रत रहते हुए अच्छा -बुरा काम करना, ये सोचकर कि जो कर रहे हैं वो क्यों कर रहे हैं, इसका फल क्या हो सकता है) - अपने ही आध्यात्मिक उत्थान के किये, अपने जीवन में सुख और शांति पाने के लिए। वैसे भी परम सत्य तो यही है की ईश्वर के बनाये इस संसार में, उसी का बनाया हुआ वही मनुष्य सुखी है जिसकी, अपना जीवन जीने के लिए कम से कम ज़रूरतें हों, आवश्यकताएं हों
 
महाराज जी सबका भला करें।

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