यूपी में जीत का योगी का आसान गणित - डॉ नरेंद्र तिवारी



ऑस्ट्रेलियाई सांसद क्रेग केली ने जब यूपी के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ की तारीफ की थी तो हर कोई हैरान था।  एक तबका तब ऐसा भी था जिसने इसे  कोरोना काल का मसला समझ कर अनसुना भी कर दिया।  लेकिन इस तारीफ के पीछे बहुत कुछ छिपा था।  एक ऐसा सच जिसे दूसरे विदेशी सांसद भी समझ नहीं पा रहे थे।  यही वजह है कि क्रेग केली को कहना  पड़ा कि हमें भी योगी चाहिए। वजह ही ऐसी थी। उत्तर प्रदेश में 'अबकी बार किसकी सरकार' या 'कौन बनेगा मुख्यमंत्री' जैसे जुमलों को समझने से पहले थोड़ा इसे समझ ले तो काफी कुछ आसान हो जायेगा।  दरअसल उत्तर प्रदेश में कोरोना कंट्रोल  के लिए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ  के मॉडल की जब  देश से बाहर  भी चर्चा हो रही थी तभी  ऑस्ट्रेलियाई सांसद क्रेग केली  ने कोरोना नियंत्रण के लिए मुख्या मंत्री  योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया, कि वह उनके मैनेजमेंट से इतने प्रभावित है कि उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में कोरोना को रोकने के लिए मुख्यमंत्री योगी को ही उधार में मांग लिया है।   क्रैग केली के ट्वीट के जवाब में यूपी सीएम ऑफिस ने ट्वीट कर उन्हें इस महामारी से निपटने के लिए यूपी के अनुभवों को साझा करने और मदद देने का भरोसा जताया। ये बात कुछ दलों के लोगों के गले शायद उतरे।  लेकिन सूबे में सकरात्मक बदलाव की इसे एक  बानगी कह सकते हैं।  ख़बरों कि माने तो 10 जुलाई का  क्रेग का यह ट्वीट करीब साढ़े 3 हजार बार रिट्वीट किया जा चुका है।

इसबात का जिक्र किस लिए किया इसे ऐसे समझा जा सकता है।  किसी भी राज्य में विकास का पैमान स्वास्थ्य  और शिक्षा को मान  सकते है।  कोरोना जैसी महामारी में आम लोगों की जान नहीं गई ऐसा नहीं है।  काफी परिवारों ने अपनों को इस दौर में खोया है। लेकिन स्वयं की सजगता के साथ सरकार का सहयोग मायने रखता है। देश के वैक्सीनेशन रिकॉर्ड में सबसे बड़ा भागीदार यूपी बना है।  कोविड के 100 करोड़ टीकों में से 12.21 करोड़ अकेले यूपी से था। एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के 75 में से 42 जिले आज पूरी तरह कोविड-फ्री हैं।  प्रदेश सरकार ने अब सभी जिला अधिकारीयों को जिम्मेदारी सौप दी है उनके यहां स्वास्थ्य सुविधा दुरुस्त है और कोविड जैसी महामारी से निपटने में कोई दिक्कत नहीं आये वो खुद इससे जुडी व्यवस्था पर नज़र रखे। स्कूलों में विशेष इंतज़ाम के साथ इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सरकारी मदद हर बच्चों तक पहुंचे।   सरकारी दावों की माने तो बदलाव सभी क्षेत्रों में हो रहा है।  मान्यता प्राप्त मदरसों के छात्रों को अगले शैक्षणिक सत्र से एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार अनिवार्य विषयों के रूप में प्रारंभिक गणित, इतिहास, प्रारंभिक विज्ञान और नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाएगा। कोशिश  मदरसा शिक्षा को अन्य स्कूलों की शिक्षा के बराबर  लाने की है।  कामिल (स्नातक) और फाजिल (स्नातकोत्तर) छात्रों की अंतिम वर्ष की परीक्षा ऑफलाइन मोड में आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया है।

 

 महज तीन  महीने बाद ही  उत्तर प्रदेश में चुनाव है।  सभी दल कमर कस कर तैयार है।  बीजेपी के पास  जहा अब मंदिर जैसा मुद्दा नहीं  है वही विपक्ष के पास अबतक ऐसा बड़ा आरोप नहीं है जो प्रदेश में योगी सरकार को निरुत्तर कर सके।  ऐसे में बीजेपी विकास कामों को ही गिनाएगी। जो आम जनता के लिए बड़ा सरोकार है।  रजनीति के जानकार मानते हैं कि  मोदी-योगी की जोड़ी फिर से राजनीति का नया प्लान लेकर तैयार है। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को पूरा भरोसा है कि केवल वह दोबारा मुख्यमंत्री चुनकर आएंगे बल्कि बीजेपी इस बार 350 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करेगी। ये जानते हुए भी कि 35 साल से यूपी में कोई भी मुख्यमंत्री दोबारा चुनकर नहीं आया, खुद योगी और उनके समर्थक  अब बोल रहे है कि हम लोग रेकॉर्ड तोड़ने के लिए ही आए हैं।  उत्तर प्रदेश जिसके के पास लोकसभा की 80 और विधानसभा की 404 सीटें हैं।  किसी भी पार्टी के लिए यहां चुनाव  जीतना उतना आसान नहीं होता जितना दिखता है।  2022 के विधानसभा में जो पार्टी यहां जीत दर्ज करेगी वही 2024 के लोकसभा चुनाव में भी अपना परचम लहरा पाएगी। यही वजह है कि बीजेपी भी फूक फूक कर कदम रख रही है।  सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के मकसद से ही उत्तराखंड में  साढ़े 4 साल में 3 बार मुख्यमंत्री बदल कर पार्टी ने आम जनता के हितो के साथ पार्टी के अंदर भी ये सन्देश  दे दिया कि दल से बड़ा कोई नहीं है।

यूपी में योगी सरकार के बेहतर काम को  अब पार्टी  दूसरे राज्यों में दिखा  कर अपनी पैठ जमाने की कोशिश में है।   पिछले कुछ चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को स्टार प्रचारक के तौर पर दूसरे सूबों में प्रचार के लिए भेजा गया।  खुद प्रदेश बीजेपी  इन दिनों चुनावी मंथन में जुटी है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में क्षेत्रवार बैठकों में इलाकेवार नब्ज टटोली जा रही है। तालमेल ठीक रखने को जनप्रतिनिधि और संगठन साथ बुलाए गए हैं। इन बैठकों में सुझाव मांगे गए कि चुनावी गुणा-गणित बीजेपी  के पक्ष में करने को क्या-क्या और करने की जरूरत है।

बीजेपी ने इस बार 350 सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। 2017 का 'अबकी बार 300 पार' का नारा चेंज कर 2022 में 'अबकी बार 350 पार' कर दिया हैं। इस बार पार्टी का पहला फोकस यूपी की कुल 80 सीटों और वेस्ट यूपी की 17 सीटों पर है। सीएम योगी ने वेस्ट यूपी के सात जिलों में 21-22 सितंबर को दौरा किया। इसके साथ ही बीजेपी 2017 के अपने विनिंग फॉर्म्युले को धार देने में भी जुटी  है। 'सर्वण +गैर यादव ओबीसी+गैर जाटव दलित' का फॉर्म्युला है। वेस्ट यूपी के अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर जाट समुदाय को साधने की कोशिश के साथ   गुर्जरों की राजधानी कहे जाने वाले गौतम बुद्ध नगर के दादरी में उनके सम्राट मिहिर भोज पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण कर पार्टी ने साफ कर दिया है वो गुर्जरों के साथ है। गुर्जरों का यूपी के 32 जिलों की 60 विधानसभा सीटों पर प्रभाव माना जाता हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में गुर्जर बीजेपी के साथ खड़ा दिखा था।

हालही में मुख्यमंत्री योगी के मंत्रिमंडल विस्तार के पीछे चुनाव ही था।  योगी मंत्रिमंडल में  अगड़ों-पिछड़ों और अनुसूचित जाति के बीच 50-50 की हिस्सेदारी है।  बीजेपी ने रणनीति के तहत दलित और ओबीसी वोट  को साधने की पूरी कोशिश की है।  योगी कैबिनेट में अगड़ी जाति के 26 मंत्री हैं।  वहीं पिछड़ी जातियों के 23 मंत्री और अनुसूचित जातियों के 9 मंत्री यूपी कैबिनेट में मौजूद हैं।  वहीं 1-1 सिख और मुस्लिम मंत्री भी शामिल किया गया है। जानकर मानते है कि मंत्रिमडल विस्तार नहीं भी होता तो बीजेपी के लिए चुनाव टेढ़ी खीर कतई नहीं है।  विपक्ष का कमजोर होना लोकतंत्र के लिए भले अच्छा माना जाता हो, बीजेपी के लिए तो वरदान ही साबित हो रहा है।  समाजवादी पार्टी को अगर छोड़ दें तो कांग्रेस और बीएसपी अबतक बड़ी चुनौती नज़र नहीं रहे है।  उत्तर प्रदेश में तीन दशक से ज्यादा समय से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस प्रियंका गांधी के चेहरे के सहारे सूबे में वापसी का सपना संजो रही है।  लेकिन  जमीनी हकीकत की बात करें, तो कांग्रेस  को बीजेपी  के साथ ही सपा और बसपा भी  टक्कर दे रहे हैं।  मजबूत संगठन का दावा कर रही कांग्रेस से बड़े चेहरों का जाना अब भी जारी है।  जितिन प्रसाद के बाद कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेशपति त्रिपाठी ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया है।  इसी साल हुए यूपी जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पहली बार बीजेपी  के प्रत्याशियों ने अमेठी  और रायबरेली से जीत दर्ज कर कांग्रेस की और फजीहत बढ़ा दी।  

यूपी की 20 फीसदी आबादी वाला मुस्लिम वोट बैंक किसके पाले में जाएगा  या फिर वोटों में बिखराव होगा ये कहना मुश्किल है। लेकिन वोट बटा तो  उसका लाभ बीजेपी ले सकती है।  पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम मतों का विभाजन साफ नजर आया था जिसकी वजह से बीजेपी की सत्ता आयी।  2022 में होने वाले चुनाव में पुराना इतिहास दोहराया जाएगा या फिर मुस्लिम समुदाय किसी एक दल के साथ जाएगा ये देखना दिलचस्प होगा।  सपा, बसपा और कांग्रेस जहां  इस वोट बैंक को साधने की कवायद में जुटी है वहीं  बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव कर  तीन करोड अल्पसंख्यकों तक पहुंचने का टारगेट सेट किया है। चुनाव का बिगुल बजने तक अगर विपक्ष एकजुट या कारगर रणनीति बनाने में कामयाब नहीं हुआ,  तो बीजेपी के लिए महज अपने पांच साल के विकास कार्यों के दम पर दोबारा सत्ता में आना कतई  टेढ़ी खीर नहीं है। 

डॉ नरेंद्र तिवारी 

स्वतंत्र पत्रकार 

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