भोगों को हम नहीं भोगते, भोग ही हमें भोगते हैं


जब हर प्रकार से आप अपना कल्याण कर लें तब धन के भोग के पीछे मत भागना अच्छे कार्य करने से ही व्यक्ति महान बनता है। विचारात्मक प्रवृत्ति रचनात्मक जरूर होनी चाहिए जिस दिन शुभ विचार सृजन का रूप ले लेता है उस दिन परमात्मा भी प्रसन्न होकर नृत्य करने लगते हैं।

कुछ ऐसा करें कि समाज की उन्नति हो समाज स्वस्थ, सदाचारी बनकर उन्नति के मार्ग पर चले जिससे सबका भला हो। वेद यही तो कहते हैं कि जब हर प्रकार से आप अपना कल्याण कर लें तब धन के भोग के पीछे मत भागना। मैंने दुनिया से बहुत लिया अब देने की बारी है अब लेने के लिये नहीं देने के लिये जीना है ये जीवन अस्थायी है इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का सम्मान करें मृत्यु आ जाएगी तो कुछ भी ना रहेगा ना यह शरीर, ना इच्छाएं, ना कल्पनाएँ, ना धन हर चीज तुम्हारे साथ यही समाप्त हो जायेगी।

भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णो वयमेव जीर्णाः॥

भोगों को हम नहीं भोगते, भोग ही हमें भोगते हैं, हम स्वयं ही (उन भोगों द्वारा) भुक्त हो जाते हैं, तप नहीं तपता, तप तो हम जाते हैं, काल नहीं बीतता, हम बीत जाते हैं, तृष्णाएं जीर्ण अथवा बूढी नहीं होतीं, हम ही जीर्ण या बूढे हो जाते हैं उनका भी यही मानना है कि तृष्णाएं सदा युवा रहती हैं जिस चंचल मन में इन तृष्णाओं का जन्म होता है वह सदा वीर्यवान् रहता है विषय उसे अपनी और आकर्षित करते हैं, तथा वह तृप्ति के साधन जुटाता हुआ अतृप्ति में ही डूबा रहता है इसी से मन को जरारहित कहा है जरा का अर्थ है बुढ़ापा।

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