धर्म और रंग का आपसी सम्बन्ध - भगवा और हरा


1857 से पूर्व यहां की राजनीति साम्प्रदायिक थी ही नही। वास्तविकता में यहां इसकी शुरुआत 1857 के महासंग्राम के बाद फ़िरंगियो की "फूट डालो और राज करो कि नीति" के अनुपालन के कारण हुआ क्योंकि बिना हिन्दू और मुस्लिम को आपस मे अलग करे यहां की एकता शक्ति को जवाब दे पाना असंभव हो चुका था। अंग्रेजो की यातनाओं के कारण समस्त लोग त्राहिमाम कर रहे थे।

सभी गुस्सा एकसाथ फूटा और भारत से ब्रिटिश तक का साम्राज्य हिला कर रख दिया गया। सारी सैनिक ताकत झोंकने के बाद भी नियंत्रण कर पाना उनके लिए असम्भव सा हो चुका था, इसी अनुभव ने उन्हें सम्प्रदयिकता का बीज बोने की प्रेरणा दी थी। हलांकि भगवा/केसरिया और हरा का इतिहास आज़ादी पूर्व क्रांति के समय से है। किन्तु आज की राजनीति और धर्म विशेष का रंगों से सम्बन्ध मुझे उन कारणों से जुड़ा हुआ प्रतीत नही होता इसलिए यहां उन कारणों के बारे में नही लिख रहा हूँ। वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ पशु या पक्षियों को सफेद और काले रंग के अलावा अन्य कोई दूसरा रंग नजर नहीं आता अर्थात उनकी जिंदगी ब्लैक एंड व्हाइट है। हम इंसान खुशनसीब हैं कि हमें सभी रंग नजर आते हैं। 'हम रंभभेद करना जानते हैं! मूल रंग- वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार रंग तो मूलत: 5 ही होते हैं- काला, सफेद, लाल, नीला और पीला। काले और सफेद को रंग मानना हमारी मजबूरी है जबकि यह कोई रंग नहीं है। इस तरह 3 ही प्रमुख रंग बच जाते हैं- लाल, पीला और नीला।

जब कोई रंग बहुत फेड हो जाता है तो वह सफेद हो जाता है और जब कोई रंग बहुत डार्क हो जाता है तो वह काला पड़ जाता है। लाल रंग में अगर पीला मिला दिया जाए, तो वह केसरिया रंग बनता है। नीले में पीला मिल जाए, तब हरा रंग बन जाता है। इसी तरह से नीला और लाल मिलकर जामुनी बन जाते हैं। आगे चलकर इन्हीं प्रमुख रंगों से हजारों रंगों की उत्पत्ति हुई। मूल रंगों का रहस्य- आपने आग जलते हुए देखी होगी, उसमें ये 3 ही रंग दिखाई देते हैं। आपको शायद आश्चर्य होगा कि ये तीनों रंग भी जन्म, जीवन और मृत्यु जैसे ही हैं, जैसा कि हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बारे में कहते हैं। शास्त्र अनुसार हमारे शरीर में स्थित हैं 7 प्रकार के चक्र। ये सातों चक्र हमारे 7 प्रकार के शरीर से जुड़े हुए हैं। 7 शरीर में से प्रमुख हैं 3 शरीर- भौतिक, सूक्ष्म और कारण। भौतिक शरीर लाल रक्त से सना है जिसमें लाल रंग की अधिकता है। सूक्ष्म शरीर सूर्य के पीले प्रकाश की तरह है और कारण शरीर नीला रंग लिए हुए है।

उपरोक्त 3 रंगों में से लाल और पीले रंग का हिन्दू धर्म में क्यों चयन किया गया है, इसका भी कारण है। उपरोक्त बताया है कि लाल और पीला मिलकर केसरिया बन जाते हैं। यह केसरिया रंग ही हिन्दू धर्म का प्रमुख रंग माना गया है।लाल रंग- हिन्दू धर्म में विवाहित महिला लाल रंग की साड़ी और हरी चूड़ियां पहनती है। लाल रंग उत्साह, उमंग और नवजीवन का प्रतीक है। प्रकृति में लाल रंग या उसके ही रंग समूह के फूल अधिक पाए जाते हैं। इसके अलावा विवाह के समय दूल्हा भी लाल या केसरी रंग की पगड़ी ही धारण करता है, जो उसके आने वाले जीवन की खुशहाली से जुड़ी है। दरअसल, लाल रंग हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। लाल रंग का उचित रीति से इस्तेमाल किया जाए तो यह आपका भाग्य बदल सकता है और गलत रीति से अधिकता में इस्तेमाल किया जाए तो यह आपको दुस्साहस और क्रोध की अग्नि में धकेल भी सकता है।

मां लक्ष्मी को लाल रंग प्रिय है। मां लक्ष्मी लाल वस्त्र पहनती हैं और लाल रंग के कमल पर शोभायमान रहती हैं। रामभक्त हनुमान को भी लाल व सिन्दूरी रंग प्रिय हैं इसलिए भक्तगण उन्हें सिन्दूर अर्पित करते हैं। लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक भी है। लाल रंग शारीरिक संचलन का रंग है इसलिए यह हमारी शारीरिक जीवन शक्ति को जगाता है। प्रेम-प्यार के प्रतीक इस रंग को कामुकता का रंग भी कहते हैं। जीवन तो उत्साह से ही चलता है। जीवन में निराशा है तो पतझड़ आ जाएगा अर्थात निराशा के भाव आपको संन्यास या आत्महत्या की ओर ले जाएंगे।पीला रंग- किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य में पीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा-पाठ में पीला रंग शुभ माना जाता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। पीला रंग वैराग्य का भी प्रतीक है। जब पतझड़ आता है तो पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस तरह पीला रंग बहुत कुछ कहता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार पीला रंग रक्त संचार बढ़ाता है। थकान दूर करता है। पीले रंग के संपर्क में रहने से रक्त कणों के निर्माण की प्रक्रिया बढ़ती है। सूजन, टॉन्सिल, मियादी बुखार, नाड़ी शूल, अपच, उल्टी, पीलिया, खूनी बवासीर, अनिद्रा और काली खांसी का नाश होता है। नीला रंग- इस ब्रह्मांड में सबसे अधिक नीला और काला रंग ही मौजूद है। निश्चित ही नीले रंग की उपस्थिति हरी-भरी प्रकृति में कम है लेकिन आकाश और समुद्र का रंग नीला होने का कारण है उनकी गहराई। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आत्मा का रंग भी नीला ही होता है। कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र एवं आत्मा का रंग है। नीले रंग के प्रकाश के रूप में आत्मा ही दिखाई पड़ती है और पीले रंग का प्रकाश आत्मा की उपस्थिति को सूचित करता है।संपूर्ण जगत में नीले रंग की अधिकता है। धरती पर 75 प्रतिशत फैले जल के कारण नीले रंग का प्रकाश ही फैला हुआ है तभी तो हमें आसमान नीला दिखाई देता है। कहना चाहिए कि कुछ-कुछ आसमानी है।

शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है। ये गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृश्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं, जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है। जब नीला रंग आपको अच्छे से दिखाई देने लगे तब समझें कि आप स्वयं के करीब पहुंच गए हैं। चक्रों के नाम- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। मूलाधार चक्र हमारे भौतिक शरीर के गुप्तांग, स्वाधिष्ठान चक्र उससे कुछ ऊपर, मणिपुर चक्र नाभि स्थान में, अनाहत हृदय में, विशुद्धि चक्र कंठ में, आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच जिसे भृकुटी कहा जाता है और सहस्रार चक्र हमारे सिर के चोटी वाले स्थान पर स्थित होता है। प्रत्येक चक्र का अपना रंग है।

केसरिया या भगवा रंग- केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। चित्त क्षोम और रात्रि अंधता में इस रंग का प्रयोग करना चाहिए। केसरिया या भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है, मतलब हिन्दू की चिरंतन, सनातनी, पुनर्जन्म की धारणाओं को बताने वाला रंग है यह। अग्नि का रंग- अग्नि में आपको लाल, पीला और केसरिया रंग ही अधिक दिखाई देगा। हिन्दू धर्म में अग्नि का बहुत महत्व है। यज्ञ, दीपक और दाह-संस्कार अग्नि के ही कार्य हैं। अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिन्दू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है। सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है, जो मुमुक्षु होकर मोक्ष के मार्ग पर चलने लिए कृतसंकल्प होते हैं। ऐसे संन्यासी खुद और अपने परिवारों के सदस्यों का पिंडदान करके सभी तरह की मोह-माया त्यागकर आश्रम में रहते हैं। भगवा वस्त्र को संयम, संकल्प और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

रंग यह बताते हैं कि हम किस धर्म से जुड़ाव रखते हैं। मसलन सनातन परंपरा को स्वीकार करने वाले लोग आपको अकसर भगवा वस्त्र धारण किए मिलेंगे वहीं इस्लाम धर्म के अनुयायी हरे रंग को पवित्र मानते हैं। पवित्रता का अर्थ- यह जानना चाहिए कि आखिर क्यों भगवा या केसरिया वस्त्र हिंदुत्व की पहचान है और क्यों हरा रंग इस्लाम में पवित्र माना गया है?

पहले समझते है कि धर्म विशेष में किसी एक रंग का महत्व आखिर है क्या-

अशुद्धियों से निजात- कहा जाता है कि अग्नि बुराई का विनाश करती है और अज्ञानता की बेड़ियों से भी व्यक्ति को मुक्त करवाती है। भगवा वस्त्र व्यक्ति के भीतर छिपी अशुद्धियों को दूर कर उसके शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह भी करता है। अग्नि का रंग- अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है, इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिंदू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है। सत्कार और उपकार, अर्थात मेहमानों का आदर करना और असहाय लोगों की सहायता करना भी वैदिक परंपरा का हिस्सा है। केसरिया रंग इन दोनों क्रियाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। केसरिया रंग- सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है जो किसी भी प्रकार की मोह-माया के बंधन से मुक्त होकर संसार को त्याग चुके हैं। वे लोग जो अपने संबंधों और इच्छाओं को छोड़कर ईश्वर की शरण में ही अपनी दुनिया बसा चुके हैं, वे भगवा वस्त्र पहना करते हैं। इससे आशय यह है कि भगवे वस्त्र को संयम और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

रोशनी का प्रतीक- केसरिया या पीला रंग सूर्य देव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। मोक्ष की इच्छा- पौराणिक समय में जीवन की सच्चाई से अवगत होकर मोक्ष प्राप्त करने के इच्छुक साधु अपने साथ अग्नि लेकर चला करते थे। यह अग्नि उनकी पहचान और उनकी पवित्रता की निशानी भी बन गई थी। लेकिन हर समय साथ में अग्नि रखना संभव नहीं था इसलिए वे साधु फिर अपने साथ केसरी रंग का झंडा लेकर चलने लगे। फिर धीरे-धीरे झंडे को रखने के स्थान पर उन्होंने केसरी या भगवा जिसे आम भाषा में संतरी रंग कहा जाता है, के वस्त्र पहनने शुरू कर दिए। बौद्ध धर्म- सनातन धर्म के अलावा अन्य भी बहुत से धर्मों में केसरी रंग को पवित्र माना गया है। जैसे कि बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के वस्त्रों को ही केसरिया रंग का दिखाया गया है। बौद्ध धर्म में यह रंग आत्म त्याग का प्रतीक माना गया है। आत्म त्याग अर्थात स्वयं को दुनियावी चीजों से निकालकर माया-मोह के बंधन से मुक्त करना।

आत्मत्याग- ऐसा माना जाता है कि बुद्ध धर्म के लिए यह रंग आत्मत्याग का प्रतीक है। यह रंग उन्हें दुनिया से अलग कर केवल भगवान से जोड़ता है। निशान साहिब- इसके अलावा सिख धर्म में भी केसरी रंग को काफी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सिख धर्म के पवित्र निशान ‘निशान साहिब’ को भी केसरी रंग में ही लपेटा जाता है। इसके अलावा सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह द्वारा बनाए गए पंज प्यारे भी केसरी लिबास में ही रहते थे। वैवाहिक जीवन की खुशहाली- इसके अलावा विवाह के समय दूल्हा भी केसरी रंग की पगड़ी ही धारण करता है जो उसके आने वाले जीवन की खुशहाली से जुड़ी है। सिख धर्म के पुरुष अनुयायी किसी भी धार्मिक कार्य के दौरान केसरी या संतरी रंग की पगड़ी ही पहनते हैं।

इस प्रकार हम कह सकते है- "हिन्दू का धार्मिक रंग भगवा है क्योंकि भगवा रंग ज्ञान का प्रतीक है ! यह अग्नि का भी प्रतीक है। जैसे अग्नि के प्रदीप्त होते ही अंधकार का नाश होता है और प्रकाश का आगमन वैसे ही भगवा इस बात का द्योतक है कि ज्ञान रुपी अग्नि में अज्ञानता का नाश हो जाता है। हिन्दू धर्म में अग्नि को आत्म ज्ञान का रूप माना गया है। भगवा के रंग में सूर्य, मंगल और बृहस्पति के रंगों को समाहित माना गया है और माना गया है कि ज्ञान की तृष्णा मंगल से, ज्ञान से सत्य कि प्राप्ति सूर्य से और ज्ञान की स्वयं प्राप्ति बृहस्पति से है यह सन्देश है भगवा के रंग में। भगवा रंग योग की अग्नि में पकने का भी सूचक है। यानी अगर कोई व्यक्ति परिपक्वता और समझदारी के एक खास स्तर तक पहुंच गया है भगवा रंग एक नई शुरुआत और परिपक्वता का सूचक है। यह रंग हमारे आभामंडल और आज्ञा चक्र से भी जुड़ा है, यह ज्ञान का भी सूचक है और यह भी बताता है कि इस इंसान ने जीवन के प्रति एक नई दृष्टि विकसित कर ली है

अब बात करते हैं हरे रंग की- हरा रंग- केसरी, भगवा या संतरी रंग से ठीक उलट हरा रंग इस्लाम धर्म के लोगों द्वारा बेहद पवित्र समझा गया है। इस्लाम में हरे रंग का अपना एक अलग और बड़ा महत्व है। पैगंबर के वस्त्र- इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मोहम्मद हमेशा हरा रंग ही धारण करते थे। उनका जामा और साफा, दोनों ही हरे रंग के हुआ करते थे। इसके अलावा भी पैगंबर की रचनाओं में भी हरे रंग का जिक्र कई बार आया, जिसमें उन्होंने इस रंग को पवित्र बताया था। जन्नत का प्रतीक- इतना ही नहीं इस्लाम से जुड़ी रचनाओं में यह भी बताया गया है कि जन्नत में रहने वाले लोग हरा वस्त्र ही धारण करते हैं। इसलिए इस्लाम धर्म में हरा रंग जन्नत का प्रतीक भी माना गया है।

सूखा मरुस्थल- मध्य पूर्व में जहां सिर्फ और सिर्फ सूखा मरुस्थल ही मौजूद है, वहां रहने वाले इस्लाम धर्म के लोग हरे रंग को इन्द्रधनुष की खूबसूरती के साथ जोड़ते हैं। ये खुशहाली और हरियाली का भी प्रतीक है। फिरंगियों का बोया बीज आज पौधे से पेड़ बन चुका है क्योंकि इस बीच 1857 से पूर्व की स्थिति बहाल हो पाना असंभव था। समय बदला, परिवेश बदला और हमने स्वतन्त्र भारत के लोकतंत्र में कदम रख दिया और फिर कभी वह पेड़ काटने की कोशिश नही की गई क्योंकि सम्भवतः देश की राजनीति ऐसे हरे भरे पेड़ो को काटना राजनैतिक पर्यावरण के लिए नुकसानदेह समझती है। रंग कोई बुरा नही होता बुरी तो सिर्फ पूर्वाग्रही मानसिकता होती है।


निखिलेश मिश्रा

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