सुख-दुख तो स्वाभाविक रूप से जीवन मे आते रहते हैं

 
हम अपने जीवन में ऐसी दृष्टि बनाये कि जीवन मे घटते हुए प्रत्येक प्रसंग को चलचित्र की भाँति देखे, साक्षी भाव से जीवन मे चलते प्रसंग को देखें। कोई हमे अपशब्द कहे अनाचार करे, दो कड़वे बोल बोले, कोई तिरस्कार करे कोई अन्याय करे सभी को जीवन में चलचित्र की तरह जाने देना चाहिए। 
 
जीवन में जो बनते हुए प्रसंग हैं उनसे हम अलग नहीं रह सकते। इतनी जागृति हममें नहीं है कि घटती घटना से अलग रहे, क्योंकि हम सामान्य मनुष्य हैं सुख दुख तो स्वाभाविक रूप से जीवन मे आते ही रहते हैं।

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