दाहिने हाथ से जो दिया जाय उसे बायाँ हाथ भी न जाने।

संभवतः यहाँ पर महाराज जी समझा रहे हैं की दान देते समय, हमारी भावना ऐसी होनी चाहिए की हमारे और भगवान के अलावा इस दान की खबर किसी को भी ना हो। वो सर्वज्ञ परम आत्मा ऐसे दान का ही हमें फल देता है जिससे आगे पीछे हमारे जीवन में सुख -समृद्धि आना भी संभव है।

महाराज जी ये भी कहते हैं की प्रचार करने से दान का पुण्य क्षीण हो जाता है। वो सर्वयापी परम आत्मा सब जगह है, सबको देखता है, सब कुछ देखता है इसलिए अपने दान का या अपने -परायों की सहायता करने के अपने कृत का बखान करने से हमें  बचना चाहिए।

वास्तव में दान करते समय या किसी की सहायता करते समय हमें तो परमात्मा का कृतज्ञ होना चाहिए कि उसने हमें माध्यम बनाया, अपने किसी दूसरे बन्दे की मदद करने के लिए, और इस कर्म से हमें पुण्य अर्जित करने का अवसर भी दिया। ऐसे करने से हमें महाराज जी का आशीर्वाद भी मिलता है।

महाराज जी सबका भला करें।

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