पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः


पुत्र भौतिक रूप में पिता से जितना ही दूर होता है अहसासों में वह उतना ही करीब हुआ जाता है ये भी अजब विरोधाभास का नाता है शायद इसीलिए शास्त्रों में पुत्र को पिता की आत्मा-स्वरुप कहा गया है आत्मा व ज़ायते पुत्र:..पिता की दुनिया में पुत्र उसी तरह अक्षुण्ण होता है जैसे शरीर में आत्मा।

बेटे के लिए संस्कृत शब्द 'पुत्र' है पुत्र का अर्थ होता है 'पुत + त्र' पुत् अर्थात् 'पुं' नामक नरक से त्राण देनेवाले को पुत्र कहते हैं। मनुस्मृति में पुत्र के इसी कर्म का ब्योरा दिया गया है।

पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः।

तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयं एव स्वयंभुवा।। [मनुस्मृतिःनवमोध्यायः-9.138

अर्थात पिता को नरक से निकालकर उत्तम स्थान प्रदान करना ही ‘पुत्र’ का कर्म है यही कारण है कि पिता की समस्त और्द्व दैहिक क्रियाएं पुत्र ही करता है मनुस्मृति आगे कहती है।

यस्मिनृणं संनयति येन चानन्त्यमश्नुते।

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः॥[मनु स्मृति 9.107]

यानी जिसके जन्म होने से पिता पितृ ऋण से मुक्त होकर और मोक्ष को प्राप्त होता है, उसे धर्मज पुत्र और अन्य को कर्मज पुत्र कहते हैं।पुत्र के बारे में आचार्य चाणक्य ने बड़े विस्तार से कहा है उन्होंने पुत्र से व्यवहार कैसा हो, इसकी सांगोपांग व्याख्या की है वे बताते हैं

लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।

प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्र वदाचरेत्॥[चाणक्य नीति 3.18]

अर्थात पाँच साल तक पुत्र का पालन-पोषण लाड़-प्यार से पालन करना चाहिए, दस साल की उम्र तक उसे छड़ी की मार से डराये, लेकिन जब वह 16 साल का हो जाए तो उसके साथ मित्र के समान व्यवहार करे।हमारे यहॉं पिता और पुत्र के बीच प्रवाहित होती ज्ञान और संस्कार की गंगा एक लंबी और  अति समृद्ध परंपरा का हिस्सा है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने ही सबसे पहले अग्नि पैदा की थी दुनिया को गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही इसी तरह ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मों में उनकी सहभागी थीं।

भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के 16 मंत्रों की रचना की है केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थेअत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए इसी कड़ी में नर और नारायण नाम के ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने ये महर्षि व्यास के पिता थे बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने यंत्र सर्वस्व नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे। 

किसी शायर ने लिखा है “जगह अब छोड़ दूँ बेटे की खातिर वो कल मेरे बराबर लग रहा था।”ये भी एक सत्य है कि जिस दिन आप बाप बनते हैं उसी दिन आप बूढ़े हो जाते हैं एक बड़ा गहरा रूपांतरण मन में हो जाता है बेटे के होने के बाद वह बाप की तरह सोचना शुरू कर देता है ये पूरा का पूरा कायांतरण का एक सिलसिला है एक काया के भीतर दूसरी काया जन्म लेती है एक पिता के लिए इससे बड़ी उपलब्धि दूसरी क्या होगी कि पुत्र उसे दिशा दिखाने लायक़ हो ।

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